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ऋग्वेद 1.35.2 में आकर्षण शक्ति: सूर्य द्वारा लोक-धारण का वैदिक भाष्यार्थ (Rigveda 1.35.2 – A Hermeneutical Analysis of Solar Attraction

ऋग्वेद 1.35.2 में आकर्षण शक्ति: सूर्य द्वारा लोक-धारण का वैदिक भाष्यार्थ (Rigveda 1.35.2 – A Hermeneutical Analysis of Solar Attraction

वेदों में आकर्षण शक्ति का उल्लेख मिलता है। सामान्यतः यह कहा जाता है कि यह ज्ञान आधुनिक विज्ञान की देन है और यूरोप के महान वैज्ञानिक Isaac Newton द्वारा सर्वप्रथम प्रतिपादित किया गया, जिसके बाद यह विचार विश्वभर में प्रसारित हुआ। निस्संदेह, न्यूटन का योगदान विज्ञान के इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।किन्तु यह मान लेना कि आकर्षण शक्ति की संकल्पना का उद्गम केवल आधुनिक युग में ही हुआ, ऐतिहासिक दृष्टि से पूर्णतः सही नहीं प्रतीत होता। भारतवर्ष में इस विषय पर बहुत प्राचीन काल से विचार होता आया है। चुम्बक और लौह के परस्पर आकर्षण को देखकर, सर्वपदार्थगत आकर्षण के सिद्धांत का अनुमान भारतीय मनीषियों द्वारा पहले ही किया जा चुका था।इस तथ्य की पुष्टि के लिए अब वेदों की एक ऋचा प्रस्तुत की जा रही है, जिससे विषय से संबंधित सभी संशयों का निराकरण हो सकेआकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यञ्च । हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ॥ - ऋग्वेद १/३५/२कृष्ण = आकर्षणशक्ति युक्त । रज = लोक 'लोका रजांस्युच्यन्ते' - निरुक्त, पृथिवी आदि लोक का नाम रज है । हिरण्यय - अपनी ओर जो हरण करे, खींच लावे, वह हिरण्यय कहाता है । जिस कारण सूर्य का रथ अर्थात् सूर्य का समस्त शरीर अपने परितः वा चारों ओर के पदार्थों को अपनी ओर खींचता है, अतः यह रथ हिरण्यय कहाता है ।अथ मन्त्रार्थ - (सविता) सूर्य (कृष्णेन रजसा वर्त्तमानः) आकर्षण शक्ति युक्त पृथिवी, बुध, बृहस्पति आदि लोकों के साथ वर्त्तता हुआ, (अमृतम् मृतम् च) अमृत, जो पृथिवी आदि लोक और मृत, जो पृथिवी आदि लोकों में रहने वाले शरीरधारी जीव, इन दोनों को (आनिवेशयन्) अपने-अपने कार्य में लगाते हुए (देवः) यह महान् देव (हिरण्ययेन रथेन) हिरण्मय = अपनी ओर हरण करने वाले अथवा स्वर्णमय/प्रकाशित रथ के द्वारा (भुवनानि पश्यन्) चारों ओर स्थित भुवनों को मानों देखता हुआ (आयाति) निरन्तर आवागमन कर रहा ॥२॥इस ऋचा में कृष्ण शब्द दिखलाता है कि सर्वपदार्थगत आकर्षण शक्ति है। पृथिवी अपनी ओर तथा सूर्य अपनी ओर खींचते हुए विद्यमान हैं, अत: सूर्य के ऊपर पृथिवी गिरकर नष्ट नहीं होती। सूर्य का घनफल (Volume) पृथिवी से लगभग १३,००,००० वा १३ लक्ष/लाख गुणा है और इस सौर्य जगत का अधिपति भी वही है । इसलिये इसमें मध्याकर्षण शक्ति भी बहुत है, इसमें हेतु की आवश्यकता नहीं। अतएव वेद में सूर्य के नाम ही कृष्ण आया है, क्योंकि वह अपनी ओर पृथिवी आदि भुवनों को खींचे हुए यथास्थिति रखे हुए है।आकाश में दिखाई पड़ने वाले सभी पिंड गतिशील हैं तथा उनमें आकर्षण शक्ति भी है। सूर्य स्वयं आकर्षण से युक्त है, वह अपने आकर्षण से ग्रहों को अपनी ओर खींचता है। सूर्य और सभी ग्रहों में गति है। यदि वे गति में न होते, तो सूर्य पर आ गिरते। सूर्य का गुरुत्व बल गतियुक्त ग्रहों को अपनी ओर खींचता रहता है, जिसके कारण से उनके पथ लगभग गोल आकृति के हो जाते हैं। इस प्रकार सूर्य का आकर्षण ग्रहों को अपनी अपनी कक्ष में स्थापित कर देता है।मंत्र में 'सविता' शब्द का प्रयोग हुआ है। सविता का अर्थ सूर्य ही है। शतपथब्राह्मण ग्रंथ (३.२.३.१८, आदि) में कहा गया है, एष वै सविता य एष (सूर्यः) तपति, अर्थात् यही सविता है, जो यह (सूर्य) तपता है।प्रस्तुत मंत्र कहता है कि सविता (सूर्य) स्वर्णिम रथ से आता है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि सूर्य बहुत चमकीला और प्रकाश से पूर्ण है। पुनः मंत्र में उल्लेख है कि यह अन्य भुवनों (ग्रहों) को देखता हुआ आता है। सूर्य उन्हें अपने प्रकाश से प्रकाशित करके देखता है। यहां सूर्य द्वारा ग्रहों को प्रकाशित करने की बात परोक्षरूप से कही गई है।☀वेद और विज्ञान में विचारों की समता☀विज्ञान कहता है कि लगभग ४५७ करोड़ वर्षों से सूर्य निरंतर प्रकाश और ऊष्मा का वितरण करता आ रहा है। प्रकाश और ऊष्मा के द्वारा वह स्थावर (जड़) और जंगम (चेतन-गतिशील) सबको जीवन प्रदान कर रहा है। इस सिद्धांत को हज़ारों वर्ष पहले ऋग्वेद के उपरोक्त मन्त्र १.३५.२ में इस प्रकार समझाया है कि अदृश्य आकर्षण शक्ति से सदा वर्तमान रहने वाला, यह सूर्य, मर्त्य (जड़) और अमृत (चेतन) पर अपनी किरणों को निक्षेप करता हुआ और लोक-लोकांतरों को देखता हुआ गुजरता है।वैज्ञानिकों के अनुसार सूर्य एक गतिशील नक्षत्र है, वह अपनी आकाश गंगा की धुरी के इर्द-गिर्द अपने सौरमंडल के साथ ३७० किलोमीटर प्रति सैंकड की गति से घूम रहा है। सूर्य ११ वर्ष में अपने अक्ष की धुरी पर एक चक्कर लगाता है और २५ करोड़ साल में अपनी आकाश-गंगा की एक परिक्रमा पूरी करता है। आकाश गंगा में अगणित नक्षत्र हैं और उन नक्षत्रों में अनगिनत सौर परिवार हैं, जिनके निकटवर्ती होकर सूर्य गुजरता रहता है। इस रहस्य को व्यक्त करते हुए ऋषि कहते हैं, सूर्य भुवनों (लोक-लोकांतरों) को देखता हुआ गुजरता है।पंडित हरिशरण सिद्धांतालंकार ने अपने ऋग्वेद भाष्य में उपरोक्त मंत्र का अर्थ इस प्रकार किया है -आ कृ॒ष्णेन॒ रज॑सा॒ वर्त॑मानो निवे॒शय॑न्न॒मृतं॒ मर्त्यं॑ च । हि॒र॒ण्यये॑न सवि॒ता रथे॒ना दे॒वो या॑ति॒ भुव॑नानि॒ पश्य॑न् ॥ - ऋग्वेद १/३५/२१. सूर्याभिमुख होकर प्रार्थना करनेवाला 'हिरण्यस्तूप' ऋषि प्रार्थना करता हुआ कहता है कि यह (आकृष्णेन रजसा वर्तमानः) अपनी ओर आकृष्ट किये हुए लोकसमूह के साथ वर्तमान (सविता) सबका प्रेरक सूर्य, हम सबको कर्मों में प्रेरित करता है और सब ऐश्वर्यों का उत्पादक होता है।२. यह सविता देव (अमृतम्) न मरने देनेवाली प्राणशक्ति को (च मर्त्यम्) तथा मरणधन शरीर को (निवेशयन्) अपने-अपने स्थान में स्थापित करता हुआ, अर्थात् 'स्व-स्थ' स्वस्थ करता है। जितना अधिक हम सूर्य-किरणों में रहते हैं, उतना ही स्वस्थ बनते हैं।३. यह (सविता देवः) कर्मों में प्रेरक प्राणशक्ति को देनेवाला सूर्य (हिरण्ययेन रथेन) अपने ज्योतिर्मय अथव हितरमणीय रथ से (भुवनानि पश्यन् याति) सब प्राणियों का ध्यान करता हुआ गति कर रहा है। सूर्य का यह रथ सबका हितकारी है। (प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः) यह सूर्य तो प्रजाओं का प्राण ही है। यह सबका हित करता हुआ अपने मार्ग पर चल रहा है।भावार्थ - यह सूर्य ही सब लोकों का केन्द्र है। यह हमारे प्राणों व शरीर को स्वस्थ रखता है। सभी का पालन करता हुआ, अपने मार्ग का आक्रमण वा सम्यक् क्रमण कर रहा है।महर्षि दयानंद सरस्वती ने अपने ऋग्वेद भाष्य में उपरोक्त मंत्र में श्लेष अलंकार से 'सविता' का अर्थ परमेश्वर और सूर्य लेकर दो अर्थ किये हैं -पदार्थान्वयभाषाः - [परमेश्वर के पक्ष में] यह (सविता) सब जगत् को उत्पन्न करनेवाला (देवः) सबसे अधिक प्रकाशयुक्त परमेश्वर (आकृष्णेन) अपनी आकर्षण शक्ति से (रजसा वर्त्तमानः) सब सूर्य्यादि लोकों के साथ व्यापक हुआ (अमृतम्) अंतर्यामिरूप वा वेद द्वारा मोक्षसाधक सत्य ज्ञान (च मर्त्यम् निवेशयन्) और कर्मों और प्रलय की व्यवस्था से मरणयुक्त जीव को अच्छे प्रकार स्थापन करता हुआ (हिरण्ययेन रथेन) यशोमय ज्ञानस्वरूप रथ से युक्त (भुवनानि पश्यन् आयाति) लोकों को देखता हुआ अच्छे प्रकार सब पदार्थों को प्राप्त होता हैं।[सूर्य के पक्ष में] यह (देवः सविता) प्रकाशयुक्त सूर्य, वृष्टि और रसों का उत्पन्न करनेवाला (कृष्णेन रजसा) प्रकाशरहित पृथिवी आदि लोकों के साथ [लोका रजांस्युच्यन्ते। - निरुक्त ४।१९] (आवर्त्तमानः) अपनी आकर्षण शक्ति से वर्त्तमान इस जगत् में (अमृतम्) वृष्टि द्वारा अमृत स्वरूप रस (च मर्त्यम् निवेशयन्) तथा काल व्यवस्था से मरण को अपने-२ सामर्थ्य में स्थापन करता हुआ, (हिरण्ययेन रथेन) प्रकाशस्वरूप गमन शक्ति से [रथो रंहतेर्गतिकर्मणः। - निरुक्त ९।११] (भुवनानि पश्यन् आयाति) लोकों को देखता हुआ, अच्छे प्रकार वर्षा आदि रूपों को अलग-२ प्राप्ति करता है ॥२॥भावार्थभाषाः - इस मंत्र में श्लेषालंकार है। जैसे सब पृथिवी आदि लोक, मनुष्यादि प्राणियों, वा सूर्यलोक अपने आकर्षण में पृथिवी आदि लोकों, वा ईश्वर अपनी सत्ता से सूर्यादि सब लोकों का धारण करता है, ऐसे क्रम से सब लोकों का धारण होता है, इसके विना अन्तरिक्ष में किसी अत्यन्त भारयुक्त लोक का, अपनी परिधि में स्थिति होने का संभव नहीं होता और लोकों के घूमे विना, क्षण, मुहूर्त्त, प्रहर, दिन, रात, पक्ष, मास, ऋतु, और संवत्सर आदि कालों के अवयव नहीं उत्पन्न हो सकते हैं ॥२॥☀आकर्षण विद्या के अन्य प्राचीन प्रमाण☀सिद्धान्त शिरोमणि नाम के ग्रन्थ में भास्कराचार्य ने एक प्राचीन श्लोक उद्धृत किया है, वह यह है -आकृष्टशक्तिश्च मही तया यत् खस्थं गुरु स्वाभिमुखीकरोति । आकृष्यते तत्पततीव भाति समे समन्तात् कुरियं प्रतीतिः॥- सर्वपदार्थ-गत एक आकर्षण शक्ति विद्यमान है, जिस शक्ति से यह पृथिवी आकाशस्थ पदार्थ को अपनी ओर करती है और जो यह खींच रही है, वह गिरता मालूम होता है अर्थात् पृथिवी अपनी ओर खींच कर आकाश में फेंकी हुई वस्तु को ले आती है, इसको लोक में गिरना कहते हैं। इससे विस्पष्ट है कि भास्कराचार्य्य से बहुत पूर्व यह विद्या देश में विद्यमान थी। आर्य्यभट्टीय नामक ज्योतिष शास्त्र में भी इसका वर्णन आया है।☀सूर्य और पृथिवी घूमते हैं (Rotate):☀यजुर्वेद का कथन है कि पृथिवी, सूर्य और उषा सदा चक्कर काटते हैं, घूमते हैं।समाववर्ति पृथिवी समुषाः समु सूर्यः। समु विश्वमिदं जगत्। - यजु० २०/२३- पृथिवी सूर्य का चक्कर काटती है, तो सूर्य अपनी धुरी पर घूमता है। इसी प्रकार यह सारा संसार गतिशील है और घूमता है।स सूर्यः... ववृत्याद् रथ्येव चक्रा। - ऋग्वेद १०.८९.२- यहांँ ऋग्वेद का कथन है कि सूर्य रथ के पहिये की तरह निरन्तर घूमता है।☀आकर्षण-शक्ति (Magnetism)☀वेदों में सूर्य की आकर्षण शक्ति का अनेक मंत्रों में उल्लेख है ।सूर्य द्युलोक का धारक : सूर्य के आकर्षण के कारण ही द्युलोक रुका हुआ है।(क) सूर्येण उत्तभिता द्यौः। - ऋग्वेद १०.८५.१- यहाँ ऋग्वेद में वर्णन है कि सूर्य ने अवलंबन-रहित स्थान में घुलोक को अपने आकर्षण (Magnetic Power) से रोका हुआ है।(ख) अस्कम्भने सविता द्याम् अदृहत्। - ऋग्वेद १०.१४९.१- आकाश में कहीं कोई अवलंबन नहीं है। द्युलोक के सभी नक्षत्र आदि सूर्य की आकर्षण शक्ति से रुके हुए हैं।☀सूर्य पृथिवी को रोके हुए है:☀सविता यन्त्रैः पृथिवीम् - अरम्णात्। - ऋग्वेद १०.१४९.१- यहाँ ऋग्वेद में वर्णन है कि सूर्य ने अपनी आकर्षण शक्ति से पृथिवी को रोका हुआ है। अतएव पृथिवी गिरने नहीं पाती। मंत्र में आकर्षण शक्ति के लिए 'यन्त्र' शब्द है। यन्त्र शब्द का अर्थ है, नियंत्रण करने वाली शक्ति ।व्यस्कम्ना रोदसी विष्णवेते, दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः। - यजु० ५.१६- यहाँ यजुर्वेद में इसी बात को और स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि सूर्य ने अपनी किरणों से, अर्थात् अपनी किरणों की आकर्षण शक्ति से, पृथिवी को चारों ओर से रोका हुआ है। इतना ही नहीं, अपितु पूरे द्यावापृथिवी को उसने अपनी आकर्षण शक्ति से रोका हुआ है।चकृषे भूमिम्। - ऋग्वेद १.५२.१२- इस ऋग्वेद के मन्त्र में भी उल्लेख है कि सूर्य अपनी आकर्षण शक्ति से भूमि को रोके हुए है।☀आकर्षण शक्ति से नक्षत्र आदि रुके हैं:☀ऋग्वेद के एक मंत्र में स्पष्ट संकेत है कि सभी नक्षत्रों आदि में अपनी-अपनी आकर्षण शक्ति है।स्वर्णरम् अन्तरिक्षाणि रोचना, द्यावाभूमी पृथिवीं स्कम्भुरोजसा । - ऋग्वेद १०.६५.४- अतएव यहाँ कहा गया है कि देवों ने द्युलोक, पृथिवी, अन्तरिक्ष और नक्षत्रों आदि को आकर्षण शक्ति से रोका हुआ है। मंत्र में आकर्षण शक्ति के लिए ओजस् (तेज, Magnetic Power) शब्द दिया गया है।☀परमाणुओं में आकर्षण शक्ति है:☀प्रत्येक परमाणु में आकर्षण शक्ति है, अतः प्रत्येक परमाणु दूसरे परमाणु को अपनी ओर आकृष्ट करता है। ऋग्वेद में इस बात को स्पष्ट किया गया है कि परमाणुओं में आकर्षण शक्ति है, अतः प्रत्येक परमाणु दूसरे परमाणु को सदा आकृष्ट करता है।एको अन्यत् - चकृषे विश्वम् आनुषक्। - ऋग्वेद १.५२.१४शब्दार्थ : (एकः) - प्रत्येक परमाणु, (अन्यत् विश्वम्) अन्य सभी परमाणुओं को, (आनुषक्) - निरन्तर, (चकृषे) अपनी ओर खींचता है ।संकलनकर्ता - आचार्य विजय आर्यसन्दर्भ ग्रन्थ-१. वैदिक विज्ञान - पंडित शिवशंकर शर्मा काव्यतीर्थ२. ऋग्वेद भाष्यम् - पंडित हरिशरण सिद्धांतालंकार३. ऋग्वेद भाष्य - महर्षि दयानंद सरस्वती४. वेदों में विज्ञान - डॉक्टर कपिलदेव द्विवेदी५. वेद सविता पत्रिका लेख - वेद और विज्ञान में सूर्य - देवकृष्ण दाश६. वेद सविता पत्रिका लेख - आकाशीय पिंडों की गतिशीलता - मृदुला अग्रवालअधिक जानकारी के लिए पढ़ें - ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, धारणाकर्षण-विषयः - महर्षि दयानंद सरस्वती- आचार्य विजय आर्य (संकलनकर्ता)

DharmaSpirituality+1
आचार्य विजय आर्यNov 9, 2025
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गीता में निराकार ईश्वर की उपासना

गीता में निराकार ईश्वर की उपासना

प्रश्न - क्या गीता के श्लोक १२/१ में साकार ईश्वर की उपासना का वर्णन है? उत्तर - जब श्रीकृष्ण ने गीता के ७वें अध्याय के श्लोक २४ में ईश्वर के मनुष्य की भांति जन्मकर व्यक्ति/साकार भाव को प्राप्त करने का पहले ही निषेध कर दिया है, तो फिर अर्जुन कोई मूर्ख नहीं था कि वह १२वें अध्याय के पहले श्लोक में साकार रूप से ईश्वर की उपासना करने वाले और योग द्वारा निराकार ईश्वर की उपासना करने वालों में से श्रेष्ठ के विषय में प्रश्न पूछता। वास्तव में इस श्लोक में कहीं भी साकार शब्द का प्रयोग ही नहीं किया गया। केवल अर्जुन ने एक भक्त और एक योगी में से तुलनात्मक श्रेष्ठ के विषय में प्रश्न किया है। कुछ लोग सगुण को साकार मानते हो, परंतु ऐसा कोई संस्कृत शब्द इस अध्याय के श्लोकों में नहीं है, जिसका अर्थ सगुण हो। और दूसरी बात सगुण का अर्थ साकार किसी भी रूप से सिद्ध नहीं होता। सगुण का अर्थ है - गुणों के सहित और साकार का अर्थ है - आकार के सहित। ईश्वर में सर्वव्यापकता, सर्वज्ञता आदि अनेक गुण होने से वह सगुण तो है; परंतु अनन्त, सीमारहित होने से उसका कोई आकार नहीं है। अर्जुन एक भक्त और एक योगी में से तुलनात्मक श्रेष्ठ के विषय में श्रीकृष्ण से प्रश्न करता है - १. एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ? - १२/१ शब्दार्थ - अर्जुन कृष्ण से प्रश्न करता है, '(एवं) इस प्रकार (ये सतत-युक्ताः भक्ताः) जो निरन्तर प्रीतियुक्त भक्त [जन] (त्वाम् परि-उप-आसते) तुझे [नाम जपकर] सर्वतः उपासते हैं (च) और (ये) जो [योगीजन ध्यानयोग द्वारा तेरे] (अक्षरम् अव्यक्तम्) अविनाशी, अव्यक्त/निराकार [स्वरूप] को (अपि) ही [उपासते हैं] (तेषाम्) उनमें से (के योगवित्तमाः) कौन योगज्ञतम [हैं] ?' भावार्थ - अर्जुन प्रश्न करता है, परमात्मा की उपासना करने वाले भक्तों तथा परमात्मा के निज/निराकार रूप के दर्शनाभिलाषी योगियों में से कौन योगज्ञतम हैं, कौन योग के मर्म को अतिशयता के साथ जाननेवाले हैं ? (क्योंकि गीता में सर्वत्र दो ही प्रकार की उपासना बताई है, एक ईश्वर के निज नाम अर्थात् ओम् जपने की और दूसरा ध्यानयोग द्वारा उपासना की, अतः यहां भक्त से तात्पर्य हुआ जो ईश्वर का ओ३म् नाम जपता है, उसको स्मरण करता है अथवा ईश्वर का भजन करता है, और योगी से तात्पर्य हुआ कि जो उसके निजस्वरूप, जो वास्तव में अव्यक्त/निराकार अथवा नेत्रों से अदृश्य है, उसका ध्यान करता है। और क्योंकि गीता में ईश्वर को साकार मान उसकी मूर्ति बनाकर पूजने का कोई भी श्लोक नहीं है, अतः ऐसी स्वकल्पित उपासना न ही किसी भक्त और न ही किसी योगी के लिए इस श्लोक में अभिप्रेत है।) अगले ४ श्लोकों के माध्यम से श्रीकृष्ण ने बताया कि भक्त और योगी में से योगी ही श्रेष्ठ है, क्योंकि योगी ही उसके निज स्वरूप का साक्षात्कार कर पाता है और उसका परिश्रम भी अधिक होता है। २. मय्यावेश्य मनो ये, मां नित्ययुक्ता उपासते। श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः। - १२/२ शब्दार्थ - कृष्ण उत्तर देते हैं, (ये) जो [योगी] (मयि मनः आवेश्य) मुझमें मन लगाकर (नित्य-युक्ताः) सतत समाहित रहते हुए (परया श्रद्धया उप इताः) परम श्रद्धा के साथ आत्मना युक्त हुए (माम् उप-आसते) मुझे उपासते हैं (ते से युक्त-तमाः मताः) वे मेरे युक्त-तम माने जाते हैं। भावार्थ - जो योगी जन अपने मन को, अपनी चित्तवृत्ति को समाहित करके परम श्रद्धा [सत्य धारणा] के साथ परमात्मा से आत्मना युक्त रहते हैं, वे ही योगज्ञतम हैं। (योगदर्शन में योग की परिभाषा है - योगश्चित्तवृत्तिः निरोधः अर्थात् अपनी चित्तवृत्ति को बाह्यविषयों से हटाकर मन को ईश्वर में ध्यानयोग के द्वारा एकाग्र करने का नाम योग है। भक्त नाम तो जपता है, परंतु क्योंकि वह ध्यानयोगी की तरह अंतर्मुख नहीं होता है, अतः वह संपूर्ण रूप से अपने को ईश्वर में आत्मना एकाग्र नहीं कर सकता है, जैसे ध्यानयोगी समाधिस्थ होकर कर पाता है, अतः योगी ही श्रेष्ठ है।) ३. ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते। सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्। - १२/३संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः। ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः। - १२/४ शब्दार्थ - (ये तु) जो तो (इन्द्रिय-ग्रामम् सम्-नियम्य) इन्द्रियों के समूह को सम्यक नियंत्रित करके (अक्षरम्, अनिःदेश्यम्, अव्यक्तम्, सर्वत्रगम्, अचिन्त्यम्, कूटस्थम्, अचलम् च ध्रुवम्) अविनाशी, अनिर्वचनीय, अव्यक्त/निराकार/अप्रकट, सर्वव्यापक, चिंतन से परे, एकरस, अचल, और स्थिर ब्रह्म को (परि-उप-आसते) सर्वतः उपासते हैं (सर्व-भूत-हिते रताः, सर्वत्र सम-बुद्धयः ते एव) सब प्राणियों के हित लीन [तथा] सर्वत्र सम-बुद्धिवाले, वे [योगी] ही (माम् प्र-आप्नुवन्ति) मुझे प्राप्त करते अथवा मेरा साक्षात्कार करते हैं। भावार्थ - उपयुक्त गुणों से उपेत ब्रह्म का साक्षात् संदर्शन योगी ही कर पाते हैं। ईश्वर चर्म चक्षुओं से नहीं दिखता, परंतु ध्यानयोग की दृष्टि से साक्षात् किया जाता है। (इस श्लोक में यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि श्रीकृष्ण ने ईश्वर को अचल और स्थिर कहा है, क्योंकि ईश्वर को अपनी सर्वव्यापकता के कारण से, कहीं भी आने-जाने की आवश्यकता नहीं है। परंतु श्रीकृष्ण स्वयं एकदेशी थे और चलते फिरते थे, ईश्वर की तरह सर्वव्यापक, अचल, स्थिर नहीं थे, इससे यह भी स्पष्ट होता है कि श्रीकृष्ण परमात्मा नहीं थे, परंतु एक जीवात्मा थे, जिन्होंने शरीर रूपी जन्म को पाया था।) ४. क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्। अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते। - १२/५ शब्दार्थ - (तेषाम् अव्यक्त-आसक्त-चेतसाम्) उन अव्यक्त/निराकार परमात्मा में आसक्त चित्तवालों का (क्लेशः) परिश्रम [भक्तों की अपेक्षा] (अधिक-तरः) अधिकतर [होता है] (हि) क्योंकि (देह-वद्भि:) देह धारियों के द्वारा (अव्यक्ता गतिः) अव्यक्त/अ-प्रकट गति (दुःखं अवाप्यते) दुःखपूर्वक अथवा कष्ट लेने के पश्चात् प्राप्त की जाती है। इस श्लोक में स्पष्ट लिखा है कि योगियों का परिश्रम भक्तों की अपेक्षा अधिकतर होता है, अतः वह ईश्वर के अव्यक्त स्वरूप को साक्षात् कर पाते हैं, अतः श्रेष्ठ भी हैं। एक अधिक परिश्रमी सदैव ही न्यून परिश्रम करने वाले से श्रेष्ठ होता है। अब कोई कहे कि केवल भक्ति अथवा ईश्वर का नाम जपने, ईश्वर का भजन करने तक ही सीमित रहे, तो वह उसकी इच्छा है, परंतु जो आगे बढ़ना चाहे तो उसके लिए श्रीकृष्ण ने छठा ध्यानयोग अध्याय भी लिखा है कि किस प्रकार आसन लगाकर ईश्वर का ध्यान करना है। जो जितना परिश्रम करेगा, उसे उतना ही अधिक परिणाम मिलेगा, यह संसार का नियम है। महाभारत में स्थान-स्थान पर लिखा है कि श्रीकृष्ण प्रातः और सायं संध्योपासना अर्थात् ध्यानयोग द्वारा ईश्वर की उपासना करते थे। अब जो श्रीकृष्ण जैसे महापुरुष का मानने वाला होगा, तो वह अवश्य ही श्रीकृष्ण की तरह ईश्वर का ध्यान लगाकर उनका अनुकरण करेगा, उनकी तरह श्रेष्ठ बनने का प्रयास करेगा। जब मनुष्य ईश्वर का नाम जप कर सकता है, तो क्या नित्यप्रति १५-२० मिनट आसन लगाकर बैठकर ध्यान और जप दोनों ही क्यों नहीं कर सकता? श्रीकृष्ण का ध्यान लगाकर ईश्वर उपासना करना यह भी सिद्ध करता है कि वह ईश्वर नहीं थे क्योंकि ईश्वर को अपनी उपासना की आवश्यकता नहीं। ॥ओ३म् तत्सत्॥

DharmaSpirituality+1
आचार्य विजय आर्यNov 8, 2025
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क्या ब्रह्मज्ञान वा ईश्वर-प्राप्ति अथवा मुक्ति के बाद जीव ब्रह्म हो जाता है?

क्या ब्रह्मज्ञान वा ईश्वर-प्राप्ति अथवा मुक्ति के बाद जीव ब्रह्म हो जाता है?

अद्वैत मीमांसाक्या ब्रह्मज्ञान वा ईश्वर-प्राप्ति अथवा मुक्ति के बाद जीव ब्रह्म हो जाता है? प्रश्न - मुण्डक में कहा है - १. यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद, ब्रह्मैव भवति । - मु० ३।२।९अर्थात् "जो उस परब्रह्म को जान लेता है, वह मानो ब्रह्म ही हो जाता है।"इसी प्रकार बृहद्० में बताया है -२. ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति । - बृहद् ० ४।४।६अर्थात् "ब्रह्म होकर, ब्रह्म को प्राप्त होता है।” उत्तर -उपनिषदों में यह प्रायः औपचारिक वर्णन हैं। 'एव' पद के प्रयोग से स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ उत्प्रेक्षालंकार है। फिर, ब्रह्म क्या है ? 'रसो वं सः' (तै० २।७), 'आनन्दो ब्रह्मेति' (तै० ३।६)। रस वा आनन्द का अपर नाम ब्रह्म है। इस प्रकार 'ब्रह्मैव भवति' का तात्पर्य है - ब्रह्मस्थ अथवा आनन्दमय होना। तैत्तिरीय उपनिषद के अनुसार -रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति । - तै० २।७- ब्रह्म को पाकर जीवात्मा भी आनन्द-मय हो जाता है। जिस प्रकार नदी के समुद्र में मिलने पर वह समुद्र के लावण्य से आप्लावित हो जाती है, उसी प्रकार आनन्दस्वरूप ब्रह्म से मिलकर जीवात्मा आनन्द से आप्लावित हो जाता है। मुक्ति से तात्पर्य ईश्वररूप होना वा ईश्वर बन जाना नहीं, वरन् ईश्वर के सान्निध्य से आनन्द प्राप्त करना है। ब्रह्म के साथ जीव के अविभाग से रहने का यही अभिप्राय है कि ब्रह्म आनन्दस्वरूप है और जीव उसका भागीदार है, अर्थात् ब्रह्म के साथ रहता हुआ जीव आनन्द का उपभोग करता है, किन्तु अपने अस्तित्व को नहीं गँवाता।प्रेम और भक्ति की पराकाष्ठा तब होती है, जब प्रेमी अपने प्रेष्ठ के प्रेम में इतना मग्न हो जाता है कि अपनी सुधबुध खोकर कहने लगता - 'जिधर देखता हूँ, उधर तू ही तू है।'योग की आठवीं सीढ़ी पर पहुँचने पर उपासक को सर्वत्र ध्येय ही दीखने लगता है। उसी अवस्था का वर्णन करते हुए ऋग्वेद में लिखा है कि -१. यदग्ने स्याहं त्वं, त्वं वा घा स्या अहम् । स्युष्टे सत्या इहाशिषः॥ - ऋ० ८/४४/२३- हे ईश्वर ! "यदि मैं तू हो जाऊँ और तू मैं हो जाए, तो तेरा आशीर्वाद संसार में सत्य हो जाए।"यह औपचारिक रूप से कही हुई 'यत्र नान्यत् पश्यति' (छा० ७।२४।१), 'न तु तद् द्वितीयमस्ति तदोऽन्यद् विभवतं यत् पश्येत्' (बृ० ४।३।३३) इत्यादि उक्तियों का यही तात्पर्य है। ये आनन्दानुभूति के अतिरेक में अतिशयता से कहे गये वचनमात्र हैं। रामानुज के मत में -ब्रह्मणोः भावः, न तु स्वरूपैक्यम् । - रामानुज-श्रीभाष्य १।१।१- अर्थात् मुक्तात्मा ईश्वर के भाव वा आनन्द को प्राप्त करता है, किन्तु उसके साथ तद्रूपता को प्राप्त नहीं होता। प्रश्न - जब ब्रह्म आनन्दस्वरूप है और उसे पाकर जीव भी आनन्दमय हो जाता है, तो दोनों एक न सही, एक-जैसे वा सदृश तो हो ही जाते हैं। देखिए प्रमाण - तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय, निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति। - मु० ३।१।३- मुण्डक के आधार पर कहा जाता है कि ज्ञानी पुरुष पाप-पुण्य से छूट निर्लेप होकर अत्यन्त साम्य वा समता को प्राप्त होता है। उत्तर - इस भ्रान्ति का निवारण करते हैं - क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः । - योग० १।२४- ईश्वर का लक्षण है - क्लेश, कर्म, कर्म-विपाक और आशयों से असंपृक्त-अछूता, विशेष चेतनतत्त्व ईश्वर है।दूसरी ओर इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख-दुःख और ज्ञान आत्मा के लक्षण हैं। -इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गमिति । - न्याय० १।१।१०ईश्वर और जीव के अपने-अपने गुण हैं। गुणों का गुणी से समवाय-सम्बन्ध होता है, अर्थात गुण और गुणी एक-दूसरे के बिना नहीं रह सकते। ईश्वर के गुण ईश्वर में और जीव के जीव में सदा बने रहेंगे। अतः ईश्वर, जीव के सदृश और जीव ईश्वर के सदृश कभी नहीं हो सकते। अतः मुक्त होकर भी जीव अल्पज्ञ और परिमित गुणकर्मस्वभाववाला ही रहेगा। वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् तथा सर्वव्यापक कभी नहीं हो सकता। गुणों में न्यूनाधिक्य होने पर भी वस्तु का स्वभाव या स्वरूप कभी नहीं बदलता। दूसरे, 'साम्यमुपैति' में 'उपैति' क्रियापद का सामञ्जस्य तभी होगा, जब पहले दोनों में भेद माना जाएगा, क्योंकि साम्य सदा भेदघटित रहता है। ब्रह्म तो स्वभाव से आनन्दस्वरूप है, जबकि जीवात्मा निमित्त से आनन्दमय होता है। जैसी स्थिति अग्नि के सम्पर्क से प्रकाश-उष्णता-युक्त एवं रक्तवर्ण बने लोहे की होती है, वैसी ही ब्रह्म के सम्पर्क से आनन्दयुक्त जीव की है। कुछ काल के लिए लोहा रक्तवर्ण अवश्य हो जाता है, किन्तु यह उसका स्वभाव नहीं बन जाता। इसी प्रकार जीव के कुछ काल तक आनन्दयुक्त हो जाने पर भी वह सदा आनन्दस्वरूप नहीं हो जाता। जो निमित्त से आनन्दमय है, वह नित्य आनन्दस्वरूप के समान कैसे हो सकता है? और कुछ नहीं, तो कालभेद तो रहेगा ही। 'ब्रह्म-विद् ब्रह्मैव भवति' अथवा 'यो वै तत्परमं ब्रह्म वेद, स ब्रह्मैव भवति' को लेकर यदि कोई आग्रह करे कि ब्रह्म को जाननेवाला सचमुच ब्रह्म हो जाता है, तो भी यहाँ 'भवति' (हो जाता है) क्रियापद से स्पष्ट है कि ब्रह्मवित् पहले ब्रह्म नहीं था, अब हुआ है। एक 'है', दूसरा 'होता है'। 'है' से नित्य का बोध होता है, 'होता है' से अनित्य का। नित्य और अनित्य में सादृश्य कैसे सम्भव है? उत्पन्न होनेवाला भाव अनित्य एवं पराधीन होता है। निमित्त से बननेवाला सादि, सादि होने से अनिवार्यतः सान्त तथा सादि-सान्त होने से अनित्य होगा। परन्तु असली ब्रह्म तो अनादि, नित्य तथा स्वभाव से आनन्दस्वरूप रहेगा और इस अन्तर के कारण, दोनों में ऐकात्म्य अथवा सादृश्य कभी न होगा। वस्तुतः आत्मा परमात्मा के स्तर तक उठने की योग्यता नहीं रखता। जीवात्मा कभी भी अपने जीव स्वरूप का परित्याग नहीं करता। वह जो कुछ करता है, 'स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते' - छां० ८।३।४ अर्थात् अपने स्वरूप में स्थिर रहकर करता है। रामानुज का स्पष्ट मत है कि "सृष्टि की उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय तथा सर्वेश्वरत्वादि गुण जीवात्मा को मुक्तावस्था में भी प्राप्त नहीं हो सकते।" -एते च जगत्पतित्व-जगद्विधरण-सर्वेश्वरत्व आदयः प्रत्यगात्मनि मुक्तावस्थायामपि न कथञ्चिद् भवन्ति । - रामानुज भाष्य - ब्रह्मसूत्र, ४।४।१३-१५, १७जीवात्मायें आकार में अणु-परिमाण हैं, जबकि सर्वश्रेष्ठ आत्मा विभु वा सर्वव्यापी है। जीवात्मा प्रभु के रचे जगत् का अनुभव कर सकता है, किन्तु जगत् की सृजनात्मक गतिविधियों के ऊपर उसका कोई वश नहीं है, क्योंकि वह केवल ब्रह्म की ही विशेष शक्ति है। असीम ऐश्वर्य की प्राप्ति जीवात्मा को कभी नहीं होती। जगत् की उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय तथा प्राणियों के कर्मफल की व्यवस्था आदि कार्य तो केवल परब्रह्म के सामर्थ्य में रहते हैं।क्या मोक्ष में जीवात्मा का ब्रह्म में विलय हो जाता है? प्रश्न - वर्षाकाल में आकाश से जो बूंदें गिरती हैं, वे समुद्र से आती हैं और नदी-नालों के रूप में बहकर अन्ततः समुद्र में जा मिलती हैं। इसी प्रकार जीवात्माओं का ब्रह्म से प्रादुर्भाव होता है और अन्ततः उसी में उनका विलय हो जाता है। मुण्डकोपनिषद् में उपलब्ध समुद्र और नदी का दृष्टान्त इसी का निरूपण करता है। वहाँ लिखा है -यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्र ऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । तथा विद्वान् नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥- मुण्डकोपनिषद ३।२।८- "जिस प्रकार नदियाँ बहती-बहती अपने नामरूप को छोड़कर समुद्र में जा मिलती हैं, उसी प्रकार विद्वान् पुरुष नामरूप का परित्याग करके परमात्मा को प्राप्त कर तद्रूप हो जाता है। उत्तर - उपर्युक्त सन्दर्भ में समुद्र से आनेवाली बूंदों के धरती पर बरसने और नदी-नालों के रूप में बहकर पुनः अपने उद्गम-समुद्र में जा मिलने से समझा जाता है कि परमात्मा से उद्भुत जीवात्मा के कालान्तर में ब्रह्म को प्राप्त कर लेने पर, उसी में उसका विलय हो जाता है और इस प्रकार उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है। यथार्थ में ऐसा नहीं है। वस्तुतः इस दृष्टान्त से जीवात्मा और परमात्मा का अभेद वा एकरूपता सिद्ध नहीं होती। कठोपनिषद् में कहा है - यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥ - कठ० ४।१५- "जैसे शुद्ध जल में शुद्ध जल मिल जाता है, वैसे ही मुक्त आत्मा ब्रह्म में मिल जाता है।"उपनिषद् के इस वचन से जीव-ब्रह्म का भेद स्पष्ट होता है, अभेद नहीं। यदि अभेद होता, तो मिलने का प्रश्न ही न उठता। संयोग सदा दो का होता है। एक में संयोग-सम्बन्ध की कल्पना नहीं की जा सकती। यदि कहा जाए कि पहले एक के दो हो गये थे, पुनः दोनों का मेल हो गया, तो एक से दो में विभक्त होनेवाले पदार्थ का सावयव एवं परिणामी होना सिद्ध है, किन्तु ब्रह्म निरवयव तथा अपरिणामी है, अतएव उसके वियुक्त और तदनन्तर संयुक्त होने का प्रश्न ही नहीं उठता। फिर, उपमा, उत्प्रेक्षा आदि भेद को दर्शाती हैं। 'तादृगेव भवति' (वैसा ही हो जाता है, परंतु वही नहीं होता।) ये शब्द ही द्वैतसिद्धि में प्रमाण हैं। यह प्रत्यक्ष है कि जल में जल मिलकर बढ़ता है, नष्ट नहीं होता । सामान्यतः समुद्र जल का भण्डार होता है। असंख्य बिन्दुओं से मिलकर समुद्र बनता है। इन बिन्दुओं से पृथक् समुद्र का अस्तित्व नहीं। यदि किसी कारण ये बिन्दु सूख जाएँ, तो समुद्र का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। यदि समुद्र की भाँति ब्रह्म को भी असंख्य जीवों का संघात माना जाएगा, तो ब्रह्म का वेदोक्त अखण्ड और निरवयव स्वरूप ही नष्ट हो जाएगा, वह सावयवी और खण्ड वाला सिद्ध होगा। ऐसा टुकड़ों वाला ब्रह्म किसी को स्वीकार्य नहीं होगा।समुद्र में जाकर नदी का प्रणाली-रूप में बहना तथा गङ्गा-यमुना आदि नाम नहीं रहता, पर वह जल जो गङ्गा-यमुना आदि नामरूप से वहाँ पहुँचा है, नष्ट नहीं हो जाता, यद्यपि समुद्र के लावण्य से वह ओतप्रोत हो जाता है। इसी प्रकार ज्ञानी पुरुष सांसारिक देहादिरूप तथा देवदत्त आदि नाम से छूटकर परब्रह्म को प्राप्त होता है। परन्तु ब्रह्मानन्द से आप्लावित होकर भी जीवात्मा अपने स्वरूप अथवा अस्तित्व को नहीं खो बैठता। मुण्डकोपनिषद् (३।२।८) के पूर्वोद्धत सन्दर्भ 'यथा नद्यः स्यन्दमानाः' इत्यादि का यही तात्पर्य है।मोक्ष में जीवात्मा की स्वतन्त्र सत्ता"ब्रह्मज्ञानी जीवात्मा उस परम ज्योति को प्राप्त करके अपने स्वरूप में बना रहता है और उसका साथी बना रहता है।" इसी आशय को छान्दोग्य और तैत्तिरीय उपनिषद् में इस प्रकार प्रकट किया है -१. परं ज्योतिरूप-संपद्य स्वेन रूपेण अभिनिष्पद्यते। - छां० ८।३।४- स्थूल शरीर और इन्द्रियों का अभाव हो जाने पर भी शुद्ध संकल्पमय शरीर के साथ जीवात्मा उस परम ज्योति को प्राप्त होकर अपने स्वरूप में बना रहता है।२. सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म, यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान्, ब्रह्मणा सह विपश्चितेति । - तैत्तिरीय उपनिषद् २।१- गुहा वा हृदयाकाश में स्थित अविनाशी, चेतनस्वरूप तथा सर्वव्यापक ब्रह्म को जो जान लेता है, वह सर्वज्ञ ब्रह्म का साथी हो जाता है और साथी रहते हुए सब प्रकार से तृप्त रहता है।इस विषय में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं निर्णायक साक्षी स्वयं आचार्य शंकर की है। वेदान्तसूत्र (४।४।१७) के भाष्य में वे लिखते हैं- ३. जगदुत्पत्त्यादि-व्यापारं वर्जयित्वा अन्यद् अणिमादि आत्मकमैश्वर्य मुक्तानां भवितुमर्हति । तेनासिन्निहितास्ते जग‌द्व्यापारे...एतेषाम् अनैकमत्ये, कस्यचित् स्थित्यभिप्रायः कस्यचित्संहाराभिप्राय, इत्येवं विरोधोऽपि कदाचित् स्यात् । - शां० भा० वेदांत ४।४।१७- "जगत् की उत्पत्ति आदि व्यापार को छोड़कर अन्य अणिमादि ऐश्वर्य मुक्तात्माओं को प्राप्त हो सकता है। जगत् के उत्पादन और आदि में मुक्तात्माओं का सहयोग-सान्निध्य सर्वथा अनपेक्षित है। यह भी सम्भव है कि उनके अनेक होने से रचना आदि के विषय में विरोध खड़ा हो जाए।" यह भी नहीं कहा जा सकत्ता कि ब्रह्म पहले ब्रह्म ही था और कालान्तर में अविद्याग्रस्त होने पर जीव हो गया और पीछे शास्त्र द्वारा तत्त्वज्ञान प्राप्त कर पुनरपि ब्रह्म हो गया, क्योंकि ऐसा मानने से 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' (मु० १।१।६), 'परास्य शक्तिवविधंव श्रूयते, स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च' (श्वेत० ६।८), इत्यादि शास्त्रवचनों का विरोध होता है, जो कहते हैं कि ईश्वर सर्वज्ञ है और उसमें स्वाभाविक ज्ञान विद्यमान है। अतः सर्वज्ञ ईश्वर कभी भी अविद्याग्रस्त नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त प्रत्येक वस्तु के दो रूप होते हैं - एक उसका बाह्यरूप - उसका आकार, प्रकार, रंगरूप आदि और दूसरा उसकी आन्तरिक सत्ता, जिसे वस्तुतत्त्व कहते हैं। नामरूप शरीर के होते हैं, जीवों के नहीं। रूप जन्म के साथ आता है‌ और नाम पुकारने की सुविधा के लिए लोगों द्वारा दिया जाता है। स्वशरीरगतबालत्वयुवत्वस्थविरत्वादयो धर्माः जीवं न स्पृशन्ति । - ब्रह्मसूत्र, रा० भा० १।१।१३- 'समय के साथ रूप बदलता रहता है, कभी-कभी इतना बदल जाता है कि पहचान में नहीं आता। कभी-कभी नाम भी बदल जाता है, किन्तु सब-कुछ बदल जाने पर भी अपनी दृष्टि में और दूसरों की दृष्टि में भी मैं ७० वर्ष बाद भी वही हूँ, जो जन्म के समय था। जो ७० वर्ष तक ज्यों-का-त्यों बना रहता है, वस्तुतः मैं वही हूँ।' संसार से विदा होते समय मैं अपने नामरूप का परित्याग कर देता हूँ, किन्तु मेरी सत्ता तब भी बनी रहती है। नदियों के समुद्र में मिलने के सम्बन्ध में जो कहा है, उसका तात्पर्य यही है कि समुद्र में मिलते समय नदियाँ अपने पहले नाम और विशेष रूप को छोड़ देती हैं, पर नदी के रूप में समुद्र में मिलने पर भी उनका वस्तुतत्त्व-जल नष्ट नहीं होता - उसकी एक भी बूंद स्वरूप से अपने अस्तित्व का परित्याग नहीं करती। यही कारण है कि नदी का जल समुद्र में मिलकर उसके जल की मात्रा को बढ़ा देता है। जल नष्ट हो गया होता, तो ऐसा कभी न होता। जलरूप में समुद्र और नदी के जल समान हैं। इतना अवश्य है कि समुद्रजल के लावण्य से नदीजल आप्लावित हो जाता है। यह ईश्वरीय व्यवस्था है कि वह जल वाष्परूप में फिर उठता, पृथिवी पर गिरता और नदीरूप में बहकर फिर वहीं पहुँच जाता है। यह क्रम अनादि-अनन्त है, अंशतः कुछ ऐसी ही स्थिति आत्मा और परमात्मा की है । बद्ध अवस्था में जीवात्मा शरीरधारी होता है। स्त्री, पुरुष, बालक, युवा आदि की अपेक्षा से शरीर होता है और शरीरों की पहचान के लिए नाम रक्खे जाते हैं। जब जीव मुक्त हो जाता है, तो शरीर नहीं रहता और शरीर के न रहने पर उसकी पहचान के लिए रक्खा गया नाम भी नहीं रहता, मात्र जीव रह जाता है। तब, जिस प्रकार नदियाँ समुद्र में मिलने के पश्चात् अपना गंगा-यमुना का नाम और रूप खो बैठती हैं, उसी प्रकार मुक्त जीव अपने बाह्यरूप - शरीर और देवदत्त, यज्ञदत्त आदि नामों को छोड़कर ईश्वर को प्राप्त होता है, परन्तु अपने नामरूप को खोकर भी मुक्तजीव का वस्तुतत्त्व--आत्मतत्त्व, नष्ट नहीं होता। हाँ, जैसे समुद्रजल के लावण्य से नदी-जल आप्लावित हो जाता है, वैसे ही ब्रह्म को साक्षात् करनेवाला आत्मा मुक्तावस्था में ब्रह्मानन्द से आप्लावित रहता है। जीवात्मा के परमात्मा में विलीन होने का यही तात्पर्य है। इसी को अभेद की स्थिति कहा जा सकता है। आत्मा अपने अस्तित्व को खो बैठता है, ऐसा कभी सम्भव नहीं। हाँ! केवल इतना और कह देना उचित होगा, जो जीव अब तक ब्रह्म नहीं थे और अब ब्रह्म के गुणों को प्राप्त करके ब्रह्म हुए हैं, उन जीवों और ब्रह्म के गुणों में समवाय (नित्य) सम्बन्ध नहीं, अपितु संयोग (अनित्य) सम्बन्ध हुआ है, इसलिए वे अनादि ब्रह्म नहीं, अपितु सादि ब्रह्म होते हैं और सादि होने से सान्त भी। परन्तु असली ब्रह्म अनादि और अनन्त है। इसलिए जीवों के ब्रह्म होने का अभिप्राय केवल इतना है कि उन्होंने ब्रह्म के आनन्द आदि कुछेक गुणों को प्राप्त कर अपने को ब्रह्म बनाया है, वे सर्वांश में सादि ब्रह्म भी नहीं होते। उनके भीतर कर्मफल दातृत्व, सृष्टिकर्तृत्व आदि गुण, तो न आते हैं और न आ सकते हैं। इसलिए सादि ब्रह्म के अर्थ उन्नत अथवा मुक्त जीव ही हो सकते है, इससे अधिक कुछ नहीं। इसलिए जीव का ब्रह्म होना असम्भव है। सब से पहली बात तो यह है कि जिन ऋषियों और मनुष्यों के ब्रह्म हो सकने का उल्लेख, बृहदारण्यक उपनिषद् के वाक्यों में किया गया है, उनके लिए स्पष्ट रूप से लिखा है कि -(वै अग्रे इदं ब्रह्म) निश्चय पहले यह ब्रह्म था, (तद् आत्मानम् एव अवेद्) उसने अपने ही को जाना कि (अहम् ब्रह्म अस्मि इति) 'मैं' ब्रह्म हूँ। (तस्माद् तत् सर्वम् अभवद्) उससे यह सब हुआ। (तद् यः यः देवानां प्रत्यबुध्यत) सो जो-जो देवो में से जाग उठे, (सः एव तद् अभवद्) वही वह (ब्रह्म) हो गये। (तथा ऋषीणां तथा मनुष्याणां) यों ऋषि और मनुष्यों में से [जो जाग उठे, वे ब्रह्म हो गये] - बृहदारण्यक, अध्याय १, ब्राह्मण ४, कण्डिका १०- अर्थात् जाग उठने (ज्ञान और कर्मयोग की पूर्णता प्राप्त करने) के बाद ब्रह्म हुए, पहले नहीं थे, इस प्रकार ये सब सादि ब्रह्म हुए और सादि होने से सान्त भी ! परन्तु असली ब्रह्म अनादि और अनन्त है, इसलिए इन नवीन हुए ब्रह्मों और असली ब्रह्म से भेद का होना स्पष्ट है। मोक्ष प्राप्त जीव सत् चित् से 'तं यथा यथोपास्ते तथैव भवति' के नियमानुसार, सच्चिदानन्द हो जाते हैं। अपनी प्रकृति से ये केवल सच्चित् होते हैं, परन्तु उत्कृष्ट प्रेम और निदिध्यासन के द्वारा ईश्वर का साक्षात्कार कर लेने से, ईश्वर का आनन्द गुण, जो ईश्वर में तो उसके स्वरूप समवाय (नित्य) सम्बन्ध के रूप में रहा करता है, परन्तु इस सच्चित् उपासक में वह संयोग (अनित्य) सम्बन्ध के रूप में आ जाया करता है, अर्थात् यह मुक्त जीव सादि और सान्त सच्चिदानन्द हो जाता है। मुक्त जीव में आनन्द तो एक सीमा के अन्दर होता हुआ, आ भी जाया करता है, परन्तु ईश्वर के ईश्वरत्व प्रदर्शन करने वाले सृष्टिकर्तृत्व आदि गुण तो संयोग (अनित्य) सम्बन्ध के रूप में भी नहीं आया करते। यही नवीन ब्रह्मत्व की सीमा है, जो सदैव याद रखनी चाहिए। जो जीव के ब्रह्म से आनन्द प्राप्त करने और जीव ईश्वर में अभेद न होने अथवा भेद होने की जो बात कही गई है, कुछेक प्रमाण उसकी पुष्टि में यहाँ दिये जाते हैं-रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति ॥ - तैत्तिरीयोपनिषद्, ब्रह्मानन्द वल्ली, सातवां अनुवाक- अर्थात् ईश्वर निश्चय से रस = आनन्दपूर्ण है, उस रसपूर्ण ईश्वर को पाकर यह जीव आनन्दी हो जाता है। द्वैताद्वैत पर विचार करते हुए याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को कहा था कि जब उपासक द्वैत की भावना वाला होता है और जब तक उसके भीतर से अहङ्कार की भावना दूर नहीं हो जाती, तब तक एक दूसरे को देखता, सुनता, सूंघता और चखता आदि है, परन्तु जब उपासक निरहङ्कार हो जाता है, जिस अवस्था के लिए याज्ञवल्क्य ने कहा है, 'यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवाभूत्' अर्थात् जब निश्चय इस (ब्रह्मवित्) का सब कुछ आत्मा (परमात्मा) ही हो गया और वह ब्रह्म में लीन होकर अपनी सुध-बुध भूल चुका है, तब किस से किस को देखे, सुने, सूंघे और चखे इत्यादि। भाव इसका यह है कि प्रेम और भक्ति की अधिकता में उपासक अपने को भूलकर सब जगह अपने प्रियतम को ही देखने लगता है, तब उसके सिवा उसकी दृष्टि में और कोई बाकी ही नहीं रहता और सब जगह उसे उसका प्रियतम ही दिखाई देने लगता है। अस्तु ये और इस प्रकार के सारे प्रकरण प्रेम और भक्ति के प्राचुर्य को प्रकट करने वाले हुआ करते हैं, इनका जीव और ब्रह्म की एकता से कुछ भी सम्बन्ध नहीं होता।मोक्ष का लक्षण (अर्थ) जीवात्मा के स्वरूप का नाश नहीं है।क्या जीवात्मा मुक्ति में ब्रह्म में मिलकर नष्ट हो जाता है।उत्तर - जीवात्मा अमर है, वह कभी नहीं मरता अथवा नष्ट होता है। इसके प्रमाण - जीवात्मा की अमरताजीवापेतं वाव किलेदं म्रियते, न जीवो म्रियते । - छां० ६।११।३- जीव से रहित होने अर्थात् जीवात्मा के शरीर से निकल जाने पर यह देह मरा हुआ कहा जाता है, आत्मा कभी नहीं मरता।न हन्यते हन्यमाने शरीरे। - कठ० १।२।१८; गीता० २।२इस प्रकार 'नाभावो विद्यते सतः' अर्थात् सत् वा भाव का कभी भी अभाव नहीं होता है। इस न्याय के अनुसार भावरूप जीव का विनाश सम्भव नहीं। फिर, यदि मोक्ष का अर्थ मर जाना है, तो इसके लिए जन्म-जन्मान्तर तक प्रयत्न करना कहाँ की बुद्धिमत्ता है? यदि मोक्षावस्था में दुःखों के साथ-साथ आत्मा का भी नाश हो जाना है, तो उसे पाने का क्या लाभ ? यह तो 'न मर्ज रहा न मरीज़' वाली बात हुई। मोक्ष पानेवाला ही न रहा, तो मोक्ष-लाभ किसे हुआ? ऐसे मोक्ष को दुःखों का नाश वा निवृत्ति न कहकर, जीव का उच्छेद अथवा आत्महत्या की चेष्टा कहना अधिक उपयुक्त होगा ।ऋषि लोग मुक्ति को भावरूप मानते हैं। ब्रह्मसूत्र (४-१५-५) के भाष्य में वात्स्यायन मुनि मोक्ष के सम्बन्ध में कहते हैं -"अभयमजरममृत्युपदं ब्रह्म क्षेमप्राप्तिरिति" अर्थात् यह अभय देनेवाली, जीर्णता से रहित, जिसमें मृत्यु का ठिकाना नहीं, वह ब्रह्म सर्वतो महान् तथा कल्याण की प्राप्ति है। 'क्षेमप्राप्ति' शब्द स्पष्टतः अभाव का विरोधी है। मोक्ष में शरीर न रहने से वह 'अमृत्युपद' है। निश्चय ही वह भावरूप है। दुःखों से छूटकर आनन्दस्वरूप परमात्मा की गोद में बैठकर आनन्द का उपभोग करना मोक्ष है। अनेकजन्मसं सिद्धस्ततो याति परां गतिम् । - गीता ६।४५- अनेक जन्मों के निरन्तर पुरुषार्थ के फल-स्वरूप मोक्ष की उपलब्धि होती है।' तब उसकी उपलब्धि होने पर यदि उपलब्धा ही न रहे, तो यह बैठे-ठाले की खिलवाड़ नहीं तो क्या है ? परिश्रम का क्या फल मिला ? अपना सर्वनाश ! मुक्तात्मा की ब्रह्म के साथ समता, केवल मुक्त दशा में आत्मा द्वारा ब्रह्मानन्द की अनुभूति के आधार पर की गई है। तैत्तिरीय उपनिषद् में कहा है-सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म योऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति।‌ - तै० २।१- "जो सत्य, चेतन व अनन्त ब्रह्म को जान लेता है, वह 'ब्रह्म के साथ रहता हुआ' और सब प्रकार के आनन्द को भोगता हुआ आप्तकाम हो जाता है।' प्रस्तुत सन्दर्भ में आये 'सह ब्रह्मणा' (ब्रह्म के साथ) शब्दों से मोक्षावस्था में मोक्षलाभ करनेवाले जीव की सत्ता का बने रहना स्पष्ट है।रामानुज-ब्रह्मसूत्रभाष्य १।१।१ में रामानुज के मत में मोक्ष आत्मा का तिरोभाव नहीं है, किन्तु बाधक मर्यादाओं को भंग करके स्वतन्त्र होना ही मोक्ष है, क्योंकि आत्मा का तिरोभाव उसका विनाश है। वस्तुतः जीवात्मा का अस्तित्व प्रत्येक अवस्था में बना रहता है। इस लेख से इतनी बातें विस्पष्ट हैं -१. जीवात्मा का अस्तित्व तथा ब्रह्म से उसका भेद अविद्याकृत नहीं है। यदि ऐसा होता, तो अविद्या का नाश हो जाने के कारण, मुक्त हो जाने पर, उसका अस्तित्व मिट जाना चाहिए था। परन्तु शंकर उसकी सत्ता का मोक्षदशा में भी बना रहना, स्पष्ट स्वीकार करते हैं।२. जीवात्मा अन्तःकरण में पड़नेवाला ब्रह्म का प्रतिबिम्ब भी नहीं है, क्योंकि यदि ऐसा होता, तो मोक्षलाभ होने पर अन्तःकरण के न रहने पर भी जीवात्मा का अस्तित्व न बना रहता ।३. समुद्र में नदियों की भाँति (सरित्सागरवत्) मोक्षावस्था में ब्रह्म में आत्मा का लय नहीं होता। यदि ऐसा होता, तो उस अवस्था में उनको 'अनेक' कैसे कहा जा सकता था ?४. जीवों को ब्रह्म का अंश अथवा अग्नि की चिंगारियों के सदृश भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि किसी भी वस्तु के अंशों अथवा अग्नि की चिंगारियों में परस्पर भेद या विरोध नहीं होता, जबकि शंकर मोक्षावस्था में जीवात्माओं में 'अनैकमत्य' तथा 'विरोध' का होना मानते हैं।५. शंकर के मत में मुक्त पुरुष सब प्रकार का सामर्थ्य प्राप्त कर लेने पर भी सृष्टि की उत्पत्त्यादि का कार्य नहीं कर सकता। यदि जीव ब्रह्म में विलीन होकर ब्रह्मरूप हो जाता, तो उसे सृष्टिनिर्माण आदि कार्य में असमर्थ क्यों बताया जाता? जो पहले भी ब्रह्म था और यदि उपाधि के कारण कुछ कसर भी थी, तो उपाधि से छूटकर मोक्षावस्था में, ब्रह्म में विलीन हो जाने से पूरी हो गई, तब उसमें किसी प्रकार की अयोग्यता क्यों रह जाए? स्पष्ट है कि किसी भी अवस्था में जीव न ब्रह्म बन सकता है, न ब्रह्म-जैसा।६. अपने यथार्थस्वरूप का ज्ञान हो जाने पर भी (अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जानेवाले राजकुमार की तरह) जीवात्मा न केवल 'ब्रह्म न भवति' अपितु 'साम्यमपि नोपैति'। अर्थात् तब भी ब्रह्म को प्राप्त अनेक अधिकारों से वंचित रहता है। ब्रह्मलोक में रहते हुए भी उसे द्वितीय श्रेणी के नागरिक का जीवन विताना पड़ता है। वह विशेषाधिकारसंपन्न ब्रह्म की बराबरी का दावा नहीं कर सकता ।७. जगत् के उत्पत्त्यादि कार्य में मुक्तात्माओं का सहयोग ही नहीं, उनका सान्निध्य भी परमेश्वर को पसन्द नहीं, क्योंकि उनके मतभेदों के कारण, उसे अपने उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय ग्रादि कार्य में बाधा पड़ने की आशंका है।८. परमेश्वर के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने की प्रवृत्ति तथा मतभेद बने रहने से उनका व्यवहार लोकवत् प्रतीत होता है, जो मुक्त-दशा में भी उनके अविद्या से मुक्त होने में सन्देह उत्पन्न करता है। अनादि काल में जब कोई आत्मा मुक्त हुआ है, उससे पहले संसार बराबर चालू रहा है। इसलिए जगत् की उत्पत्ति आदि में मुक्तात्मा को निमित्त या प्रयोजक नहीं माना जा सकता। वस्तुतः मुक्तात्मा कभी परब्रह्म के कार्य का अधिकारी या स्थानापन्न नहीं हो सकता । जीवात्मा को मुक्तावस्था में प्राप्त ऐश्वर्य-सम्बन्धी शास्त्रवचनों का तात्पर्य उसके अधिकार की सीमा में अवस्थित ऐश्वर्य को प्रकट करना है। वह अब बिना किसी बाधा के अपने सामर्थ्य से सब भावनाओं की अनुभूति में पूर्ण क्षमता रखता है। पर, इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वह परब्रह्म के सदृश हो गया है। ध्यातव्यम् - इस लेख का अधिकांश भाग स्वामी विद्यानंद सरस्वती कृत तत्त्वमसि पुस्तक और कुछ भाग महात्मा नारायण स्वामी कृत एकादशोपनिषद पुस्तक से लिया गया है।लेख सम्पादनकर्ता - आचार्य विजय आर्य ॥ओ३म्॥

DharmaSpirituality+1
आचार्य विजय आर्यNov 7, 2025
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 वेदों में विविध शस्त्रास्त्र

वेदों में विविध शस्त्रास्त्र

शस्त्र और अस्त्र : जो धनुष वा अन्य यन्त्र के द्वारा फेंका जाता है, उसे अस्त्र (Missile) कहते हैं। जिन्हें हाथ में लेकर लड़ा जाता है, उन्हें शस्त्र कहते हैं, जैसे - असि (तलवार), कुन्त (भाला) आदि। इसमें भाला दूर फेंकने पर अस्त्र का कार्य भी कर सकता है।प्रश्न - क्या वेद में शस्त्रास्त्र बनाने की विधि है?उत्तर - वेद में शस्त्रास्त्र बनाने की विधि नहीं है, परंतु भौतिक और रासायनिक विज्ञान का मूल है, जिसके आधार पर अस्त्र-शास्त्र निर्माण किए जा सकते हैं, परंतु निर्माण करने की कोई विस्तृत विधि नहीं है। हाँ, उसमें विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र और उनके गुण अथवा प्रभाव हैं। यही अस्त्र रामायण और महाभारत के युद्ध में भी प्रयुक्त हुए थे। शस्त्रास्त्र बनाने की विस्तृत विधि ऋषियों और विद्वानों द्वारा वेद के आधार पर लिखे गए उपवेद - धनुर्वेद में लिखी बतायी जाती है, परंतु यह ग्रन्थ बहुत काल से लुप्त है। वर्तमान में उपलब्ध संक्षिप्त धनुर्वेद वास्तविक नहीं है अथवा अपूर्ण है।दिव्यास्त्रवेदों में अस्त्र (Missile) के लिए हेति और मेनि शब्द हैं। दिव्य अस्त्रों का प्रभाव असाधारण होता है। ये प्राकृतिक शक्तियों से जन्य होते हैं, जैसे - विद्युत्, अग्नि, वायु आदि से जन्य और विज्ञान के विशिष्ट विद्वानों द्वारा निर्मित होते हैं। इन दिव्य अस्त्रों और अन्य शस्त्रों का उल्लेख वेदों में मिलता है -(१) आग्नेयास्त्र या अग्निबाण : आग्नेय अस्त्र को अग्निबाण भी कहते थे। इसके प्रयोग से जलती हुयी आग चारों ओर फैल जाती थी। यह अग्नि के साथ धुआँ भी फेंकता था, जिससे शत्रु मूर्छित हो जाते थे। अथर्ववेद में वर्णन है कि आग्नेय अस्त्र के प्रयोग से शत्रु मूर्छित हो गए और इन्द्र वा राजा ने उनके सिर काट लिए -मू॒ढा अ॒मित्रा॑श्चरताशी॒र्षाण॑ इ॒वाह॑यः। तेषां॑ वो अ॒ग्निमू॑ढाना॒म् इन्द्रो॑ हन्तु॒ वरंवरम् ॥ - अथर्ववेद ६.६७.२- (मूढाः अमित्राः) हे व्याकुल वा मूर्छित शत्रुओं ! (अशीर्षाणः) बिना शिरवाले [शिर कटे] (अहयः इव चरत) साँपों के समान चेष्टा करो। (इन्द्रः) प्रतापी वीर राजा (अग्निमूढानाम् तेषां वः) अग्नि [आग्नेय शस्त्रों] से व्याकुल हुए उन तुम्हारे (वरंवरम् हन्तु) श्रेष्ठ-श्रेष्ठ नायक को चुनकर मारे ॥२॥इनके प्रयोग से नेत्र से अन्धा होने का भी वर्णन है। शत्रु अन्धे हो गए और सेना पराजित हो गई -इन्द्रः॒ सेनां मोहयतु म॒रुतो॑ घ्न॒न्त्वोज॑सा। चक्षूंष्य॒ग्निरा द॑त्तां॒ पुन॑रेतु॒ परा॑जिता ॥ - अथर्ववेद ३.१.६पदार्थभाषाः - (इन्द्रः सेनाम् मोहयतु) प्रतापी सूर्य [शत्रु] सेना को व्याकुल कर दे। (मरुतः) दोषनाशक पवन के झोंके वाले (ओजसा घ्नन्तु) शस्त्रास्त्र के बल से नाश कर दें। (अग्निः) अग्नि-आग्नेयास्त्र (चक्षूंषि) नेत्रों वा दर्शन-शक्ति को (आ, दत्ताम्) निकाल देवे। [जिससे] (पराजिता) हारी हुई सेना (पुनः एतु) पीछे चली जावे ॥६॥भावार्थभाषाः - युद्धकुशल सेनापति राजा अपनी सेना का व्यूह ऐसा करे, जिससे उसकी सेना सूर्य, वायु और अग्नि वा बिजुली और जल के प्रयोगवाले अस्त्र, शस्त्र, विमान, रथ, नौकादि के बल से शत्रुसेना को नेत्रादि से अङ्ग-भङ्ग करके सर्वदा हराकर भगा दे ॥६॥(२) वायव्यास्त्र - इसको मारुत अस्त्र भी कहते हैं। इसके प्रयोग से आंधी जैसी तेज हवा चलने लगती है और शत्रु किंकर्तव्यविमूढ हो जाते हैं। अथर्ववेद में वर्णन है कि इन्द्र इस अस्त्र के प्रयोग से शत्रुओं को इधर-उधर भगा दे -इन्द्र॒ सेनां मोहया॒मित्रा॑णाम्। अ॒ग्नेर्वात॑स्य॒ ध्राज्या॒ तान्विषू॑चो॒ वि ना॑शय ॥ - अथर्ववेद ३.१.५पदार्थभाषाः - (इन्द्र) हे बड़े ऐश्वर्यवाले राजन् ! (अमित्राणाम् सेनाम् मोहय) शत्रुओं की सेना को व्याकुल कर दे। (अग्नेः वातस्य ध्राज्या) अग्नि के और पवन के झोंके से (विषूचः) सब ओर फिरनेवाले अथवा विरुद्ध गतिवाले (तान्) उन चोरों को (वि, नाशय) नाश कर डाल ॥५॥भावार्थभाषाः - राजा अपनी सेना के बल से शत्रुसेना को जीते और जैसे दावानल वन को भस्म करता और प्रचण्ड वायु वृक्षादि को गिरा देता है, वैसे ही विघ्नकारी वैरियों को मिटाता रहे ॥५॥(३) रुद्रास्त्र : यजुर्वेद में रुद्र के इस अस्त्र का वर्णन है और इससे रक्षा की प्रार्थना की गई है -परि॑ नो रु॒द्रस्य॑ हे॒तिर्वृ॑णक्तु॒ परि॑ त्वे॒षस्य॑ दुर्म॒तिर॑घा॒योः। अव॑ स्थि॒रा म॒घव॑द्भ्यस्तनुष्व॒ मीढ्व॑स्तो॒काय॒ तन॑याय मृड ॥ - यजु० १६.५०पदार्थभाषाः -हे (मीढ्वः) सुख वर्षाने हारे राजपुरुष ! आप जो (रुद्रस्य हेतिः) दुष्टों को रुलाने वाले सभापति राजा का वज्र है, उससे (त्वेषस्य) क्रोधादिप्रज्वलित (अघायोः) अपने से दुष्टाचार करने हारे पुरुष के सम्बन्ध से (नः परि-वृणक्तु) हम लोगों को सब प्रकार पृथक् कीजिये। जो (दुर्मतिः) दुष्टबुद्धि है, उससे भी हम को बचाइये और जो (मघवद्भ्यः) प्रशंसित धनवालों से प्राप्त हुई (स्थिरा) स्थिर बुद्धि है, उसको (तोकाय) शीघ्र उत्पन्न हुए बालक के लिये (तनयाय) कुमार पुरुष के लिये (परि, तनुष्व) सब ओर से विस्तृत करिये और इस बुद्धि से सब को निरन्तर (अव, मृड) सुखी कीजिये ॥५० ॥भावार्थभाषाः - राजपुरुषों का धर्मयुक्त पुरुषार्थ वही है कि जिससे प्रजा की रक्षा और दुष्टों को मारना हो, इससे श्रेष्ठ वैद्य लोग सब को आरोग्य और स्वतन्त्रता के सुख की उन्नति करें, जिससे सब सुखी हों ॥ ५० ॥(४) ब्रह्मास्त्र : यह ब्रह्म का अस्त्र माना जाता है। इसकी प्रहारक शक्ति असाधारण होती है। इसकी कोई काट नहीं। अथर्ववेद में कहा गया है कि यह सबसे बड़ा प्रहारक है। यह अस्त्र घोर तपस्या का फल है -चक्षुषो हेते मन॑सो हेते ब्रह्म॑णो हेते तप॑सश्च हेते। मे॒न्या मे॒निर॑स्य॑मे॒नय॒स्ते सन्तु ये॒स्माँ अ॑भ्यघा॒यन्ति॑ ॥ - अथर्ववेद ५.६.९पदार्थभाषाः - हे (चक्षुषः हेते) चक्षु के वज्र/आयुध ! हे (मनसः हेते) मन के आयुध ! हे (ब्रह्मणः हेते) ब्रह्म वा विद्वान् के आयुध ! और (तपसः च हेते) तपः सामर्थ्य के आयुध ! तू (मेन्याः मेनिः असि) मेनि = वज्र का भी तू वज्र है अथवा आयुध का भी तू आयुध है। (ये अस्मान्) जो हम पर (अभिघायन्ति) सब तरफ़ से पापाचार करना चाहते हैं, (ते अमेनयः सन्तु) वे सदा बिना हथियार के रहें।भावार्थभाषाः - शत्रु पर नेत्रदृष्टि रख कर उसको दबाना चक्षु का शस्त्र फेंकना है। मानस - मन्त्र वा विचार शक्ति के प्रयोग से शत्रु को पराजित करना मन का हथियार चलाना है, विद्वानों के विज्ञान द्वारा निर्मित महासंहारक अस्त्र का प्रयोग करना ब्रह्मास्त्र वा ब्रह्म का हथियार चलाना है। इसी प्रकार बल, तपस्या, सहनशक्ति से शत्रु पर वार करना, तप का हथियार चलाना है, अथवा तप और विद्या के प्रयोग से शस्त्रों का निर्माण और प्रयोग करके शत्रु को पराजित करना चाहिए।(५) वारुणास्त्र वा वरुण के पाश : अथर्ववेद में इसका उल्लेख है। ये नागपाश अर्थात् साँप की तरह मनुष्य को लिपट कर बांध लेते हैं और पापी को जकड़ कर मार देते हैं -ये ते॒ पाशा॑ वरुण स॒प्तस॑प्त त्रे॒धा तिष्ठ॑न्ति॒ विषि॑ता॒ रुष॑न्तः। छि॒नन्तु॒ सर्वे॒ अनृ॑तं॒ वद॑न्तं॒ यः स॑त्यवा॒द्यति॒ तं सृ॑जन्तु ॥ - अथर्ववेद ४.१६.६पदार्थभाषाः - (वरुण) हे दुष्टनिवारक परमेश्वर वा राजन् ! (सप्तसप्त= सप्तसप्ताः) सात धाम [पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, विराट् अर्थात् स्थूल जगत्, परमाणु और प्रकृति] से सम्बन्धवाले, (त्रेधा) तीन प्रकार से [भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान काल में] (विषिताः) फैले हुए (रुशन्तः) [दुष्टों वा दोषों को] नाश करते हुए (ये ते पाशाः तिष्ठन्ति) जो तेरे फाँस वा जाल स्थित हैं, (सर्वे) वे सब जाल (अनृतं वदन्तम्) मिथ्या बोलनेवाले को (छिनन्तु) छिन्न-भिन्न करें, और (यः सत्यवादी) जो सत्यवादी है, (तम्) उसको (अति सृजन्तु) सत्कार पूर्वक छोड़ें ॥६॥भावार्थभाषाः - वह वरुण परमात्मा वा नियमों में रखने वाला राजा, दुष्टों को यथावत् दण्ड और शिष्टों को यथावत् आनन्द देता है ॥६॥(६) सम्मोहनास्त्र : अथर्ववेद में उल्लेख है कि इस अस्त्र के प्रयोग से शत्रुसेना को मोहित वा मूर्छित कर दिया जाता है और उसके हाथ काट लिए जाते हैं अथवा उनको निःशस्त्र/निहत्था कर दिया जाता है -अ॒ग्निर्नः॒ शत्रू॒न्प्रत्ये॑तु वि॒द्वान्प्र॑ति॒दह॑न्न॒भिश॑स्ति॒मरा॑तिम्। स सेनां मोहयतु॒ परे॑षां॒ निर्ह॑स्तांश्च कृणवज्जा॒तवे॑दाः ॥ - अथर्ववेद ३.१.१पदार्थभाषाः - (अग्निः) अग्नि [के समान तेजस्वी] (विद्वान्) विद्वान् राजा (अभिशस्तिम्) मिथ्या अपवाद और (अरातिम् प्रतिदहन्) शत्रुता को सर्वथा भस्म करता हुआ (नः) हमारे (शत्रून् प्रति, एतु) शत्रुओं पर चढ़ाई करे। (सः जातवेदाः) वह प्रजाओं का जाननेवाला वा बहुत धनवाला राजा (परेषाम् सेनाम् मोहयतु) शत्रुओं की सेना को मोहित वा मूर्छित कर देवे, (च) और [उन वैरियों को] (निर्हस्तान् कृणवत्) निहत्था कर डाले ॥१॥भावार्थभाषाः - जो मनुष्य प्रजा में अपकीर्ति और अशान्ति फैलावे, विद्वान् अर्थात् नीतिनिपुण राजा ऐसे दुष्टों और उनके साथियों को यथावत् दण्ड देवे, जिससे वे लोग निर्बल होकर उपद्रव न मचा सकें ॥१॥परि॒ वर्त्मा॑नि स॒र्वत॒ इन्द्रः॑ पू॒षा च॑ सस्रतुः। मुह्य॑न्त्व॒द्यामूः सेना॑ अमित्राणां परस्त॒राम् ॥ अथर्ववेद ६.६७.१पदार्थभाषाः - (इन्द्रः च पूषा) बड़े ऐश्वर्यवाला राजा और पोषण करनेवाला मन्त्री (वर्त्मानि सर्वतः परि-सस्रतुः) मार्गों पर सब दिशाओं में, सब ओर चलते रहे हैं। [उनके द्वारा सम्मोहनास्त्र के प्रयोग से] (अमित्राणाम् अमूः सेनाः) शत्रुओं की वे सब सेनायें (अद्य परस्तराम् मुह्यन्तु) आज बहुत दूर मोहित-व्याकुल होकर चली जावें ॥१॥भावार्थभाषाः - युद्धकुशल राजा और मन्त्री के उपाय से शत्रु की सब सेनायें भाग जावें ॥१॥(७) तामसास्त्र : चारों वेदों में इसका उल्लेख है। यह अस्त्र अश्रुगैस (Tear Gas) के तुल्य होता है। वह चारों ओर धुआँ फैला देता है। धुएँ से चारों ओर अंधेरा हो जाता है। शत्रुसेना के सैनिकों का दम घुटने लगता है और वे किंकर्तव्यविमूढ होकर इधर-उधर भागने लगते हैं। इसके लिए कहा गया है कि इससे शत्रुसेना के सैनिक एक दूसरे को पहचान नहीं पाते हैं। यह अंगों को शिथिल कर देता है -अ॒सौ या सेना॑ मरुतः॒ परे॑षाम॒स्मानैत्य॒भ्योज॑सा॒ स्पर्ध॑माना। तां वि॑ध्यत॒ तम॒साप॑व्रतेन॒ यथै॑षाम॒न्यो अ॒न्यं न जा॒नात् ॥ - अथर्व० ३.२.६पदार्थभाषाः - (मरुतः) हे शूर पुरुषों ! (परेषाम् असौ या सेना) वैरियों की वह जो सेना (अस्मान् अभि) हमको चारों ओर से (ओजसा) बल के साथ (स्पर्धमाना आ-एति) स्पर्धा करती हुई अथवा ललकारती हुई चढ़ी आती है, (ताम्) उसको (अपव्रतेन तमसा विध्यत) क्रियाहीन कर देनेवाले अन्धकार से छेद डालो, (यथा एषाम् अन्यः अन्यम्) जिससे इनका कोई किसी को परस्पर (न जानात्) न जाने वा पहचाने ॥६॥यह मन्त्र यजुर्वेद में इस प्रकार है−अ॒सौ या सेना॑ मरु॒तः परे॑षाम॒भ्यैति॑ न॒ ओज॑सा॒ स्पर्ध॑माना। तां गू॑हत तम॒साप॑व्रतेन॒ यथा॒मी ऽअ॒न्योऽअ॒न्यन्न जा॒नन् ॥ - यजु० १७.४७पदार्थभाषाः - (मरुतः) हे शूरों ! (परेषाम् असौ या सेना) वैरियों की वह जो सेना (नः) हमको (अभि) चारों ओर से (ओजसा स्पर्धमाना) बल के साथ स्पर्धा करती हुई अथवा ललकारती हुई (आ, एति) चली आती है, (ताम्) उसको (अपव्रतेन तमसा गूहत) क्रियाहीन कर देनेवाले अन्धकार से ढक दो, (यथा अमी अन्यः अन्यम्) जिससे वे लोग एक दूसरे को (न जानन्) न जानें ॥४७॥इस तामस अस्त्र का दूसरा नाम 'अप्वा' भी है -अ॒मीषां॑ चि॒त्तं प्र॑तिलो॒भय॑न्ती गृहा॒णाङ्गा॑न्यप्वे॒ परे॑हि। अ॒भि प्रेहि॒ निर्द॑ह हृ॒त्सु शोकै॑र॒न्धेना॒मित्रा॒स्तम॑सा सचन्ताम् ॥ - ऋग्वेद १०.१०३.१२पदार्थभाषाः - (अप्वे) हे अप्वा, स्वास्थ्य से गिरानेवाले रोग या शान्ति से गिरानेवाले भयरूप अस्त्र ! (त्वम्) तू (परा इहि) यहाँ से परे हो जा, पृथक् हो जा (अमीषाम्) इन शत्रुओं के (चित्तम्) चित्त को, मन-बुद्धि-अहङ्कार को (प्रतिलोभयन्ती) मूढ़ करते हुए (अङ्गानि गृहाण अभि प्र इहि) उनके अङ्गों को पकड़-जकड़ शिथिल कर उन्हें प्राप्त हो, (शोकैः हत्सु निर्दह) सन्तापों से उनके हृदयों को निर्दग्ध कर दे, सर्वथा दग्ध कर दे (अमित्राः) शत्रुजन [तुम्हारे द्वारा] (अन्धेन सचन्ताम्) घने अन्धकार से संसक्त हो जावें ॥१२॥भावार्थभाषाः - संग्राम में शत्रुओं के प्रति ऐसा ओषधियों का अस्त्रप्रयोग धूमरूप या वायुरूप-गैस फेंकना चाहिये, जो मानसिक रोग या भय को उत्पन्न कर दे, उनके मन आदि को दूषित तथा अन्य अङ्गों को निष्क्रिय-शिथिल बना दे, हृदयों को जलादे और घने अन्धकार में हुए जैसे बना दे ॥१२॥त्रिष॑न्धे॒ तम॑सा॒ त्वम॒मित्रा॒न्परि॑ वारय। पृ॑षदा॒ज्यप्र॑णुत्तानां॒ मामीषां मोचि॒ कश्च॒न ॥ अथर्ववेद ११.१०.१९पदार्थभाषाः - (त्रिषन्धे) हे त्रिसन्धि ![तीनों कर्म, उपासना और ज्ञान में मेल रखनेवाले त्रयीकुशल राजन्] (त्वम्) तू (तमसा) अन्धकार से (अमित्रान् परि वारय) वैरियों को घेर ले। (पृषदाज्यप्रणुत्तानाम्) दही घृत [आदि खाद्य वस्तुओं] से हटाये गये (अमीषाम्) इन शत्रुओं में से (कश्चन मा मोचि) कोई भी न छूटे॥१९॥भावार्थभाषाः - राजा शत्रुओं को आग्नेय आदि अस्त्र-शस्त्रों से अचेत और खान-पान आदि पदार्थों से शून्य करके हरा देवे ॥१९॥तामसास्त्र के धुंए से शत्रुसेना पीड़ित हो जाए -धू॑मा॒क्षी सं प॑ततु कृधुक॒र्णी च॑ क्रोशतु। त्रिष॑न्धेः॒ सेन॑या जि॒ते अ॑रु॒णाः स॑न्तु के॒तवः॑ ॥ - अथर्ववेद ११.१०.७पदार्थभाषाः - (धूमाक्षी) धूमपीड़ित वा धुएँ भरी आँखोंवाली शत्रुसेना (सं पततु) पृथ्वी पर गिर जाये, (च कृधुकर्णी) और युद्ध-वाद्य की ध्वनि से मन्द कानोंवाली किंकर्तव्यविमूढ़ होकर (क्रोशतु) आक्रोश करें वा रोये और चिल्लायें। (त्रिषन्धेः सेनया जिते) त्रिसन्धि - 'जल, स्थल और वायुसेना' के सेनापति की सेना द्वारा जीतने पर (अरुणाः केतवः सन्तु) विजय की सूचक अरुण वा रक्त वर्ण वाली पताका होवें ॥७॥भावार्थभाषाः - वीर सेनापति के आग्नेयास्त्र और धूमास्त्र के धुँए से वैरियों की आँखें धुँधला जायें और पटह/ढोल आदि युद्ध-वाद्य की ध्वनि से उनके कान बहरे हो जायें। वे पृथ्वी पर गिर पड़े, रोयें और चिल्लायें। इस प्रकार जीत होने पर अन्य दुष्टों को भयभीत करने के लिए सेनापति अपनी जय-पताका ऊँची करे ॥७॥(८) ऐन्द्रास्त्र वा वज्र : यह अयस् अर्थात् उत्तम कोटि के लोहे या फौलाद का बना हुआ होता था। गीता १०.२८ में आयुधों में वज्र के सदृश महासंहारी होने के कारण श्रीकृष्ण ने आयुधानामहं वज्रम् द्वारा अपने आप को वज्र कहा है। यह इन्द्र वा सेनापति का प्रमुख अस्त्र है। चारों वेदों के अनेक मन्त्रों में वज्र की चर्चा है -अ॒स्मा इदु॒ त्वष्टा॑ तक्ष॒द्वज्रं॒ स्वप॑स्तमं स्व॒र्यं रणा॑य। वृ॒त्रस्य॑ चिद्वि॒दद्येन॒ मर्म॑ तु॒जन्नीशा॑नस्तुज॒ता कि॑ये॒धाः ॥ - अथर्ववेद २०.३५.६पदार्थभाषाः - (अस्मै) इस संसार के हित के लिये (इत्) ही (उ) विचारपूर्वक (त्वष्टा) सूक्ष्म करनेवाले [सूक्ष्मदर्शी विश्वकर्मा सभापति] ने (स्वपस्तमम्) अत्यन्त सुन्दर रीति से काम सिद्ध करनेवाला, (स्वर्यम्) सुख देनेवाला (वज्रम्) वज्र [कठोर शस्त्र] (रणाय तक्षत्) रण जीतने के लिये तीक्ष्ण किया है। (ईशानः) ऐश्वर्यवान् सभापति (तुजता येन) जिस काटने वा मारने वाले वज्र से (वृत्रस्य मर्म चित् तुजन्) वैरी के मर्म [जीवन स्थान] को ही हिंसित करते हुए (विदत्) उस वज्र को प्राप्त करके (कियेधाः) कितने ही श्रेष्ठ प्राणियों का धारण-पोषण करता है ॥६॥भावार्थभाषाः - सभापति राजा तीक्ष्ण-तीक्ष्ण अस्त्र-शस्त्रों से शत्रुओं को दण्ड देकर प्रजा को आनन्द देवें ॥६॥अथर्ववेद में वर्णन है कि १०० गांठ वाला भी वज्र होता है -ए॒वा त्वं दे॑व्यघ्न्ये ब्रह्म॒ज्यस्य॑ कृ॒ताग॑सो देवपी॒योर॑रा॒धसः॑ ॥ वज्रे॑ण श॒तप॑र्वणा ती॒क्ष्णेन॑ क्षु॒रभृ॑ष्टिना ॥ प्र स्क॒न्धान्प्र शिरो॑ जहि ॥ - अथर्ववेद १२.५.६५-६७पदार्थभाषाः - (देवि) हे देवी ! [उत्तम गुणवाली], (अघ्न्ये) हे अवध्य ! [न मारने योग्य गौ अथवा प्रबल वेदवाणी] (त्वम् एव) तू इसी प्रकार (ब्रह्मज्यस्य) ब्रह्मज्ञ वा वेदज्ञ ब्राह्मण के हानिकारक, (कृतागसः) अपराध करनेवाले पापी, (देवपीयोः) देव वा विद्वानों के हिंसक, (अराधसः) आराधनाहीन वा अदानशील पुरुष के (स्कन्धान्) कन्धों और (शिरः) शिर को (शतपर्वणा) सौ वा सैकड़ों ग्रंथि-गांठ-जोड़ वाले, (तीक्ष्णेन क्षुरभृष्टिना वज्रेण प्र प्र जहि) तीक्ष्ण-तेज, छुरे की सी धारवाले वज्र से तोड़-तोड़ दे ॥६५-६७॥भावार्थभाषाः - वेदानुयायी धर्मात्मा राजा वेदविरोधी दुष्टाचारियों को प्रचण्ड दण्ड देवे ॥६५-६७॥इस वज्र से एक साथ सौ व्यक्तियों का वध किया जा सकता है -मे॒निः श॒तव॑धा॒ हि सा ब्र॑ह्म॒ज्यस्य॒ क्षिति॒र्हि सा ॥ - अथर्ववेद १२.५.१६पदार्थभाषाः - (सा) वह [वेदवाणी] (हि) निश्चय से (ब्रह्मज्यस्य) ब्रह्मज्ञ वा वेदज्ञ ब्राह्मण के हानिकारक की (शतवधा मेनिः) शतघ्नी [सैकड़ों को मारनेवाली] वज्र है, (सा हि) वह ही [उसका] (क्षितिः) नाश रूप है ॥१६॥भावार्थभाषाः - जो मनुष्य वेदप्रचारकों को हानि पहुँचाता है, वह संसार की हानि कर के आप भी अनेक विपत्तियों में पड़ता है ॥१६॥न वेप॑सा॒ न त॑न्य॒तेन्द्रं॑ वृ॒त्रो वि बी॑भयत्। अ॒भ्ये॑नं॒ वज्र॑ आय॒सः स॒हस्र॑भृष्टिराय॒तार्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥ - ऋग्वेद १.८०.१२पदार्थभाषाः - हे सभापते राजन् ! (स्वराज्यमन्वर्चन्) अपने राज्य का सत्कार करता हुआ तू, जैसे (वृत्रः वेपसा) मेघ वेग से (इन्द्रम् न विबीभयत्) सूर्य्य को भय प्राप्त नहीं करा सकता और वह मेघ गर्जन वा प्रकाश की हुई (तन्यता न) बिजुली से भी भय को नहीं दे सकता, (एनम्) इस मेघ के ऊपर सूर्यप्रेरित (सहस्रभृष्टिः) सहस्र प्रकार के दाह से युक्त (आयसः) लोहे के शस्त्र वा आग्नेयास्त्र के तुल्य (वज्रः) वज्ररूप किरण (अभ्यायत) चारों ओर से प्राप्त होता है, वैसे शत्रुओं पर आप होयें ॥ १२ ॥भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। जैसे मेघ आदि सूर्य्य को नहीं जीत सकते, वैसे ही शत्रु भी धर्मात्मा सभा और सभापति का तिरस्कार नहीं कर सकते ॥ १२ ॥(९) अथर्ववेद में विभिन्न प्रकार के बाणअयो॑मुखाः सू॒चीमु॑खा॒ अथो॑ विकङ्क॒तीमु॑खाः। क्र॒व्यादो॒ वात॑रंहस॒ आ स॑जन्त्व॒मित्रा॒न्वज्रे॑ण॒ त्रिष॑न्धिना ॥ - अथर्ववेद ११.१०.३पदार्थभाषाः - (अयोमुखाः) लोहे समान कठोर मुखवाले बाण, (सूचीमुखाः) सुई के तुल्य पैने मुखवाले बाण, (विकङ्कतीमुखाः) शमी वृक्षों के से कंटीले मुखवाले बाण, (क्रव्यादः) शत्रुओं के कच्चे मांसों को मानो खानेवाले बाण (अथो) और (वातरंहसः) वायु के समान वेगवाले बाण (वज्रेण त्रिषन्धिना) वज्ररूप त्रिसन्धि अर्थात् 'जल, स्थल, वायु' तीन सेना के अध्यक्ष से [प्रेरित हुए] (अमित्रान् आ सजन्तु) शत्रुओं को आ लगें ॥३॥(१०) युद्ध में विजय के लिए विविध शस्त्रास्त्रये बा॒हवो॒ या इष॑वो॒ धन्व॑नां वी॒र्याणि च। अ॒सीन्प॑र॒शूनायु॑धं चित्ताकू॒तं च॒ यद्धृ॒दि। सर्वं॒ तद॑र्बुदे॒ त्वम॒मित्रे॑भ्यो दृ॒शे कु॑रूदा॒रांश्च॒ प्र द॑र्शय॥ - अथर्ववेद ११.९.१पदार्थभाषाः - (ये बाहवः) जो भुजाएँ, (याः इषवः) जो बाण हैं (च धन्वनाम् वीर्याणि) और धनुषों वा धनुर्धारियों के वीर कर्म हैं, उनको तथा (असीन्) खड्ग/तलवारों, (परशून्) परशूओं-कुठारों-कुल्हाड़ों, (आयुधम्) युद्ध सम्बन्धी अस्त्र-शस्त्रों को, (च यत् हृदि चित्ताकूतम्) और जो हृदय में [विजय के] विचार और सङ्कल्प हैं, (तत् सर्वम्) उस सब को (अर्बुदे) हे अर्बुदि ! [शूर सेनापति राजन्] (त्वम्) तू (अमित्रेभ्यः दृशे कुरु) अमित्रों-शत्रुओं के लिये देखने हेतु संनद्ध कर, (च) और (उदारान् प्र दर्शय) [हमें अपने] बड़े उपायों को दिखा दे ॥१॥भावार्थभाषाः - सेनापति राजा अपने योद्धाओं, अस्त्र-शस्त्रों, हृदय के विचारों और मनोरथों को दृढ़ करके शत्रुओं को भयभीत करने के लिए दिखाये और इन उपायों द्वारा उन्हें रोककर अपनी प्रजा की यथावत् रक्षा करे ॥१॥ध्यातव्यम् - विभिन्न शास्त्रास्त्रों के वेद-प्रमाणों की जानकारी आचार्य कपिलदेव द्विवेदी द्वारा लिखित "वेदों में विज्ञान" पुस्तक से ली गई है और वेद मन्त्रों के अर्थ महर्षि दयानन्द सरस्वती, स्वामी ब्रह्ममुनि, पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी आदि आर्य विद्वानों के वेदभाष्यों से उद्धृत किए गए गये हैं। यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि वेद युद्ध द्वारा अनावश्यक और अनुचित हिंसा का समर्थन नहीं करता, परंतु श्रेष्ठों की रक्षा और दुष्टों के नाश के लिए वह युद्ध का समर्थक अवश्य है।- आचार्य विजय आर्य

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आचार्य विजय आर्यNov 6, 2025
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वेदों में परमात्मा और जगत् का स्वरूप

वेदों में परमात्मा और जगत् का स्वरूप

यस्य भूमिः प्रमान्तरिक्षमुतोदरम्। दिवं यश्चक्रे मूर्द्धानं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः॥ - अथर्ववेद १०.७.३२- (यस्य भूमिः) जिस ईश्वर की भूमि वा पृथ्वी रूपी रचना (प्रमा) पाद वा चरण संज्ञा है अर्थात् जैसे पाद-चरण शरीर का भार वहन करते हैं, वैसे ही पृथ्वी पाद वा चरण सदृश अपने ऊपर रहने वाले प्राणियों का भार वाहन करती है। इसके अतिरिक्त जैसे शरीर में पाद वा चरण का स्थान नीचे होता है, वैसे ईश्वर रचित सृष्टि में पृथिवी नीचे होने से पादस्थानी वा पादतुल्य है। (उत अन्तरिक्षम् उदरम्) और अन्तरिक्ष रूपी रचना उदर संज्ञा है अर्थात् जैसे उदर शरीर के मध्य भाग में होता है, ऐसे ही ईश्वर की सृष्टि में जो पृथिवी और सूर्य के बीच में अन्तरिक्ष-आकाश है, सो उदरस्थानी है, (यः दिवं मूर्धानम् चक्रे ) और जिसने [सृष्टि रचना के समय] दिव अर्थात् प्रकाश करने वाले तारों आदि पदार्थों को मूर्धा-स्थान को किया अर्थात् ऊपर मस्तक-स्थानीय बनाया, (तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः) उस परब्रह्म को हमारा अत्यन्त नमस्कार हो॥यस्य सूर्यश्चक्षुश्चन्द्रमाश्च पुनर्णवः। अग्निं यश्चक्र आस्यं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः॥ - अथर्ववेद १०.७.३३- (यस्य सूर्यश्चक्षुश्चन्द्रमाश्च पुनर्णवः) और जिस ईश्वर की सूर्य और चन्द्रमा रूपी रचना चक्षु संज्ञा है, उन्हें ईश्वर ने सृष्टि में चक्षुवत् नेत्रस्थानीय किया है। जो कल्प कल्प के आदि में सूर्य और चन्द्रमादि पदार्थों को वारम्वार नवीन रचता है, (अग्निं यश्चक्र आस्यम्) और जिसने मुख वा मुख्य स्थानी अग्नि को उत्पन्न किया है, (तस्मै॰) उसी ब्रह्म को हम लोगों का नमस्कार हो॥यस्य वातः प्राणापानौ चक्षुरङ्गिरसोऽभवन्। दिशो यश्चक्रे प्रज्ञानीस्तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः॥ - अथर्ववेद १०.७.३४- (यस्य वातः प्राणापानौ) जिसने ब्रह्माण्ड के वायु को प्राण और अपान की तरह किया है, (चक्षुरङ्गिरसोऽभवन्) तथा जो प्रकाश करने वाली किरण हैं, वे चक्षु की तरह जिसने की हैं, अर्थात् उनसे ही रूप ग्रहण होता है। (दिशो यश्चक्रे प्रज्ञानीस्त॰) और जिसने दश दिशाओं को सब व्यवहारों को सिद्ध करने वाली बनाईं हैं, ऐसा जो अनन्तविद्यायुक्त परमात्मा सब मनुष्यों का इष्टदेव है, उस ब्रह्म को निरन्तर हमारा नमस्कार हो।सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं सर्वत स्पृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥ - यजुर्वेद ३१.१पदार्थभाषाः - हे मनुष्यो! (सहस्रशीर्षा) सब प्राणियों के हजारों शिर (सहस्राक्षः) हजारों नेत्र और (सहस्रपात्) असङ्ख्य पाद जिसके बीच में हैं, ऐसा (पुरुषः) सर्वत्र परिपूर्ण व्यापक जगदीश्वर है। (सः सर्वतः) वह सब देशों से (भूमिम् स्पृत्वा) भूगोल को सब ओर से व्याप्त होकर (दशाङ्गुलम्) पाँच स्थूलभूत, पाँच सूक्ष्मभूत ये दश जिसके अवयव हैं, उस सब जगत् को (अति, अतिष्ठत्) उल्लङ्घन कर स्थित होता अर्थात् सब से पृथक् भी स्थिर होता है॥१॥भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! जिस पूर्ण परमात्मा में हम मनुष्य और जगत् आदि के असंख्य शिर, आँखें और पग आदि अवयव हैं, जो भूमि आदि से उपलक्षित हुए पाँच स्थूल और पाँच सूक्ष्म भूतों से युक्त जगत् को अपनी सत्ता से पूर्ण कर जहाँ जगत् नहीं, वहाँ भी पूर्ण हो रहा है, उस सब जगत् के बनानेवाले परिपूर्ण सच्चिदानन्दस्वरूप नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव परमेश्वर को छोड़ के अन्य की उपासना तुम कभी न करो, किन्तु उस ईश्वर की उपासना से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करो ॥१ ॥इस मंत्र में परमात्मा को 'सहस्रशीर्ष,' 'सहस्राक्ष' और 'सहस्रपात्' अर्थात् हज़ारों शिर, हज़ारों आँख और हज़ारों पैरवाला अलंकार-रूप से वर्णन किया गया है। सायण, महीधर, उदयन सभी भाष्यकारों ने इस मंत्र का वही अर्थ किया है, जो यहाँ ऊपर दिया गया है। सब प्राणियों के शिर, आँख, पग आदि उसी परमात्मा के अंदर विद्यमान हैं, इसी से उसे हज़ारों शिर, आँखों और पैरोंवाला कहा है।पौराणिक भाष्यकार उव्वट-महीधर, करपात्री आदि ने भी इन मंत्रों के इसी प्रकार के अर्थ किये हैं।दूसरा ऋग्वेद का मंत्र ईश्वरीय शक्तियों का ऐसी ही अलंकृत भाषा में निम्न प्रकार से वर्णन करता है -विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्। स बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव एकः॥ - ऋग्वेद १०.८१.३पदार्थान्वयभाषाः - (विश्वतः-चक्षु) सर्वत्र व्याप्त नेत्र शक्तिवाला वा सर्वद्रष्टा (उत) और (विश्वतः-मुखः) सर्वत्र व्याप्त मुख शक्तिवाला अर्थात् सब पदार्थों के ज्ञानकथन की शक्तिवाला वा सर्ववक्ता (विश्वतः-बाहुः) सर्वत्र व्याप्त भुज शक्तिवाला अर्थात् सर्वत्र पराक्रमी वा सर्वशक्तिमान् (उत) और (विश्वतः-पात्) सर्वत्र व्याप्त शक्तिवाला अर्थात् विभु गतिमान् (एकः-देव) एक ही वह शासक परमात्मा (पतत्रैः) प्रकृति के परमाणुओं द्वारा (द्यावाभूमी जनयन्) द्युलोक पृथिवीलोक-समस्त जगत् को उत्पन्न करता हुआ (बाहुभ्याम्) भुजाओं से-बल पराक्रमों से (संधमति) सम्पूर्ण जगत् को चलाता है ॥३॥भावार्थभाषाः - जितनी भी मनुष्य के अन्दर अङ्गों की शक्तियाँ होती हैं, वे एकदेशी हैं, परन्तु परमात्मा की दर्शनशक्ति, वक्तृशक्ति, भुजशक्ति, पादशक्ति ये व्यापक हैं, इसी से वह द्यावापृथिवीमय ब्रह्माण्ड को कारण प्रकृति के परमाणुओं से उत्पन्न करके स्वाधीन करता हुआ यथायोग्य व्यापार करता है ॥३॥महीधर ने भी आँख, मुख, बाहु, पाँव आदि से उन-उन शक्तियों का ग्रहण किया है, साकार इन्द्रियों का नहीं।पौराणिक भाष्यकार उव्वट-महीधर, करपात्री आदि ने भी इस मंत्र के इसी प्रकार का अर्थ किया है।उदयनाचार्य ने भी 'न्याय कुसुमांजलि' में इसके ऐसे ही अर्थ किए हैं। 'विश्वतश्चक्षु' का अर्थ सर्वज्ञ, 'विश्वतोमुख' का सर्ववक्ता, विश्वतोबाहु का सर्वसहकारिता, 'विश्वतस्पात्' का व्यापकता इत्यादि किया है।यस्तिष्ठ॑ति॒ चर॑ति॒ यश्च॑ वञ्चति॒ यो नि॒लायं॒ चर॑ति॒ यः प्र॒तङ्क॑म्। द्वौ सं॑नि॒षद्य॒ यन्म॒न्त्रये॑ते॒ राजा॒ तद्वे॑द॒ वरु॑णस्तृ॒तीयः॑॥ - अथर्ववेद ४.१६.२पदार्थान्वयभाषाः - (यः तिष्ठति चरति) जो पुरुष बैठा-खड़ा है वा चलता है, (यः च वञ्चति) और जो पुरुष ठगी करता है, और (यः निलायं चरति) जो छिप-छिपकर चलता है, षड्यन्त्रादि करता है और (यः प्रतङ्कम् [चरति]) जो भय का संचार करता है और (द्वौ संनिषद्य) दो जने एक साथ बैठकर (यत् मन्त्रयेते) जो कुछ मन्त्रणा, गुप्त विचार करते हैं, (तृतीयः राजा) तीसरा राजा (वरुणः) वरणीय वा दुष्टनिवारण वरुण परमेश्वर (तत् वेद) उसे जानता है ॥२॥भावार्थभाषाः - परमेश्वर प्राणियों के गुप्त से गुप्त कर्मों को सर्वथा जानता और उनका यथावत् फल देता है ॥२॥उपनिषद और गीता में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ईश्वर हाथ, पैर आदि इन्द्रियों से रहित है, परंतु उसमें सब इन्द्रियों की शक्ति विद्यमान है। देखो नीचे प्रमाण -सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं सुहृत्॥ - श्वेताश्वतर उपनिषद ३.१७अर्थ - वह समस्त इन्द्रियों से रहित होकर भी समस्त इन्द्रियों के कार्यव्यापारों को स्वसामर्थ्य और स्वशक्ति से ही करने वाला है। सबका स्वामी-नियन्ता और सबका बृहद् आश्रय है।उपनिषद् के एक अन्य श्लोक में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ईश्वर बिना हाथ, पैर, नेत्र इत्यादि इन्द्रियों के कार्य करने में समर्थ है -अपाणिपादो जवनो ग्रहीता, पश्यत्यचक्षुः, स शृणोत्यकर्णः। स वेत्ति वेद्यं, न च तस्यास्ति वेत्ता, तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्॥ - श्वेताश्वतरोपनिषद् - ३/१९- (सः अपाणिपादः) वह परमात्मा हाथ-पैरों से रहित होकर भी (ग्रहीता) समस्त वस्तुओं को ग्रहण करनेवाला तथा (जवनः) वेगपूर्वक सर्वत्र गमन/कर्म करनेवाला है, (अचक्षुः पश्यति) आँखों के बिना ही वह सब कुछ देखता है, और (अकर्णः शृणोति) कानों के बिना ही सब कुछ सुनता है, (सः वेद्यम्) वह जो कुछ भी जानने में आने वाली वस्तुएँ हैं, उन सबको (वेत्ति) जानता है, (च) परंतु (तस्य वेत्ता न अस्ति) उसका सम्पूर्णया जाननेवाला कोई नहीं है, ज्ञानी पुरुष (तम्) उसे (महान्तम्) महान् (अग्र्यम् पुरुषम् आहुः) आदि वा श्रेष्ठ पुरुष कहते हैं ॥ १९ ॥भावार्थ - वह बिना हाथ के भी सबका ग्रहण करने वाला, पैर से रहित होकर भी वेगवाला है। आँखों से रहित होकर भी देखता है, और कानों से रहित होकर भी सुनता है। वह प्रत्येक जानने योग्य वस्तु को जानता है, परंतु उसका अंत जानने वाला अन्य कोई नहीं है। उसे ज्ञानीजन महान्, श्रेष्ठ आदि कहते हैं॥इस लेख की रचना में महर्षि दयानंद रचित ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका और अन्य आर्य विद्वानों के लेखों से सहायता ली गई है।

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आचार्य विजय आर्य Nov 5, 2025
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परमात्मा का ज्ञान - वेद

परमात्मा का ज्ञान - वेद

वह कौनसा ज्ञान है, जो परमात्मा के असीम ज्ञान में सनातन रूप से प्रतिष्ठित रहता है और प्रत्येक सृष्टि के आदि में ऋषियों के माध्यम से संसार के कल्याणार्थ परमात्मा द्वारा प्रदान किया जाता है? वह कौनसा ज्ञान है, जिसे हमारे प्राचीन महापुरुष और ऋषि-मुनि सर्वश्रेष्ठ मानकर पढ़ते-पढ़ाते रहे, परन्तु जिसे हम उन महापुरुषों और ऋषि-मुनियों की सन्तानों ने पढ़ना-पढ़ाना छोड़ दिया अथवा इतना महत्वपूर्ण नहीं माना? वह है ईश्वरीय सनातन विद्या - वेद ज्ञान! इसी प्रकार वेदवर्णित ओ३म् मुख्य नामक परमेश्वर ही सृष्टि के आदि काल से हमारे महापुरुषों और ऋषि-मुनियों का उपासनीय परमदेव रहा; परन्तु हम ने उसे छोड़कर अन्य देव, जो स्वयं वेदोक्त परमदेव की सन्ध्या द्वारा उपासना करते थे, उन्हीं को उपासनीय मान लिया। आइये इन वेदों को पढ़े और वेदोक्त ईश्वर की उपासना करें। श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों ने स्वयं वेदों को पढ़कर अपने जीवन को ऊंचा उठाया -श्रीराम वेदवेदाङ्गवेत्ता थेवाल्मीकि रामायण में श्रीराम का गुण वर्णन करते हुए नारद मुनि कहते हैं -रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता। वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः॥ बालकाण्ड १/१४- श्रीराम स्वधर्म और स्वजनों के पालक, वेद-वेदाङ्गों के तत्त्ववेत्ता तथा धनुर्वेद में प्रवीण हैं॥हनुमान् स्वयं वेदों के विद्वान् थेवाल्मीकि रामायण के अनुसार हनुमान् वेद और व्याकरण पढ़े हुये थे और इसलिये शुद्ध उच्चारण करते थे। जब हनुमान् ने प्रथम मिलन में श्रीराम और लक्ष्मण से शुद्ध भाषा में वार्तालाप करके उनकी प्रशंसा करी और अपना परिचय दिया, तब श्रीराम ने उनके विषय में लक्ष्मण से कहा -वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धा काण्ड, तृतीय सर्गनानृग्वेद-विनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः। नासामवेदविदुषः शक्यमेवं विभाषितुम्॥२८॥- 'जिसे ऋग्वेद की शिक्षा नहीं मिली, जिसने यजुर्वेद का अभ्यास नहीं किया तथा जो सामवेद का विद्वान् नहीं है, वह इस प्रकार सुन्दर भाषा में वार्तालाप नहीं कर सकता' ॥२८॥नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम्। बहु व्याहरतानेन न किंचिदपशब्दितम् ॥२९॥- 'निश्चय ही इन्होंने सम्पूर्ण व्याकरण ‌का कई बार स्वाध्याय किया है; क्योंकि बहुत-सी बातें बोलने से भी इनके मुख से कोई अशुद्धि नहीं निकली'॥२९॥श्रीकृष्ण भी वेदवेदाङ्गों के विद्वान् थे -वेदवेदाङ्गविज्ञानं बलं चाप्यधिकं तथा। नृणां लोके हि कोऽन्योऽस्ति विशिष्टः केशवादृते ॥ महाभारत, सभा० ३८ । १९- भीष्म पितामह श्रीकृष्ण की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि - ये वेद-वेदाङ्गों के तो मर्मज्ञ हैं ही, बलशाली भी सबसे अधिक हैं। कृष्ण के अतिरिक्त संसार के मनुष्यों में दूसरा कौन सबसे बढ़कर है? जिन वेदों को महापुरुषों ने भी पढ़ा और उसको पढ़कर विद्वान् हुए, उन वेदों को अपने से विमुख करना कहां तक उचित है? सब दर्शन ग्रंथ, उपनिषद और यहां तक मनुस्मृति विशेष कर वेदों की ही प्रशंसा करते हैं और अत्रि स्मृति में भी वेद से बढ़कर कोई शास्त्र नहीं माना गया है -महर्षि अत्रि के अनुसार—नास्ति वेदात् परं शास्त्रम्। (अत्रिस्मृति १५१)- वेद से बढ़कर कोई शास्त्र नहीं है।गरुड़पुराण में भी कहा है - वेदाच्छास्त्रं परं नास्ति [ गरुड़० उ० ख० ब्र० का० १० । ५५ ]- वेद से बढ़कर संसार में कोई शास्त्र नहीं है।इसलिए महर्षि मनु ने मनुस्मृति में कहा है -योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्। स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः॥ मनु० २।१६८- जो द्विज वेद को न पढ़कर अन्यत्र वेदविरुद्ध ग्रन्थों के अध्ययन में व्यर्थ परिश्रम करता है, वह जीते-जी परिवार-सहित शूद्रत्व को प्राप्त हो जाता है।वेदश्चक्षुः सनातनम् [मनु० १२ । ९४ ]- वेद मानवमात्र के लिए सनातन चक्षुः हैं।वेदोऽखिलो धर्ममूलम्। (मनु २-६)- अखिल-चारों वेद धर्म के मूल हैं।महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं―यज्ञानां तपसाञ्चैव शुभानां चैव कर्मणाम्। वेद एव द्विजातीनां निःश्रेयसकरः परः ।।―(याज्ञ० स्मृ० १/४०)अर्थ―यज्ञ के विषय में, तप के सम्बन्ध में और शुभ-कर्मों के ज्ञानार्थ, द्विजों के लिए वेद ही परम कल्याण का साधन है।अत्रिस्मृति श्लोक ३५१―श्रुतिः स्मृतिश्च विप्राणां नयने द्वे प्रकीर्तिते। काणःस्यादेकहीनोऽपि द्वाभ्यामन्धः प्रकीर्तितः ।।अर्थ―श्रुति=वेद और स्मृति―ये ब्राह्मणों के दो नेत्र कहे गये हैं। यदि ब्राह्मण इनमें से एक से हीन हो तो, वह काणा होता है और दोनों से हीन होने पर अन्धा होता है।बृहस्पतिस्मृति ७९ में वेद की प्रशंसा इस प्रकार की गई है―अधीत्य सर्ववेदान्वै सद्यो दुःखात् प्रमुच्यते। पावनं चरते धर्मं स्वर्गलोके महीयते।।अर्थ―वेदों का अध्ययन करके मनुष्य शीघ्र ही दुःखों से छूट जाता है, वह पवित्र धर्म का आचरण करता है और स्वर्गलोक में महिमा को प्राप्त होता है।यह सब संक्षेप में बताया गया है, सभी शास्त्रों में और भी वेद की प्रशंसा में वाक्य भरे पड़े हैं।वेद बनाम अष्टादश पुराणवेद में एक ही ओ३म् मुख्य नाम वाचक परमदेव की उपासना है, जिसके शिव, विष्णु, ब्रह्मा, ब्रह्म, अग्नि, वायु आदि गुण-कर्म-स्वभाव अनुसार अन्य गौण नाम भी हैं।इसके विपरीत अष्टादश पुराणों में प्रत्येक पुराण अपने अपने देव को ऊंचा बताता है और दूसरे देवों को नीचा दिखाता और अपने मुख्य देव का दास बताता है। इस प्रकार विष्णु को मानने वाले वैष्णव, शिव को मानने वाले शैव और देवी को मानने वाले शाक्त मतों में परस्पर ईर्ष्या-द्वेष दिखाने वाले यह सब ग्रंथ हैं। ऐसे परस्पर विरोधी ग्रन्थों को पढ़ने से कुछ भी लाभ नहीं है। वेदों में ऐसा द्वेषभाव नहीं है, केवल एक ईश्वर की पूजा है। इसके अतिरिक्त वेद ईश्वर प्रदत्त ज्ञान होने से निर्दोष हैं, और पुराण मानव रचित हैं, इसलिए इनमें त्रुटि होनी संभव है। अतः वेद स्वतः प्रमाण कहे गए हैं और दूसरे ग्रंन्थों को परतः प्रमाण माना गया है।अष्टादश पुराणों में अनेक असत्य भरे हुये हैं, महापुरुषों की निंदा है, अश्लीलता है, व्यभिचार है - शिवपुराण, गीताप्रेस गोरखपुर, रुद्रसंहिता, युद्धखंड ५, अध्याय २३ में बताया गया कि विष्णु ने जालंधर की पत्नी वृंदा का शीलहरण किया और शिवपुराण, गीताप्रेस गोरखपुर, रुद्रसंहिता, युद्धखंड ५, अध्याय ४१ में बताया गया कि विष्णु द्वारा शंखचूड की पत्नी तुलसी का शीलहरण किया गया। भागवत पुराण में श्रीकृष्ण परनारी कंस की दासी कुब्जा से समागम कर रहे हैं, और रासलीलाओं में भी परनारीगमन चल रहा है। इसी भागवत पुराण में शिव जी को अपनी पत्नी सती के सामने ही मोहिनी के पीछे भगाया गया और भागते-भागते वीर्यपात करा दिया गया। ब्रह्मवैवर्त पुराण में महापुरुष कृष्ण को परनारी विरजा के साथ समागम करते दिखाया गया, जिसके कारण राधा ने उन्हें चोर-जार कहकर पृथ्वी पर जन्म लेने का शाप दिया। पुराणों में ब्रह्मा जैसे ऋषि और देव को अपनी पुत्री सरस्वती पर ही आसक्त दिखाया है। इसलिये ऐसे अपने महापुरुषों की निंदायुक्त असत्य मिश्रित ग्रन्थों को त्यागकर ईश्वर प्रदत्त पूर्ण सत्य वेदज्ञान को प्राप्त करना चाहिए। वेद की वास्तविक पुराण - पुराने वा प्राचीनतम ग्रन्थ हैं अथवा कुछ अन्य विद्वान् ऋषियों के बनाये हुए वेदव्याख्या ग्रंथ - शतपथ, गोपथ, ऐतरेय और तांड्य आदि ब्राह्मण ग्रंथों को पुराण कहते हैं। केवल इतना कह सकते हैं कि जो अष्टादश पुराणों में जो वेदानुकूल सत्य बातें हैं, उनका ही ग्रहण करना चाहिए, शेष असत्य का त्याग कर देना चाहिए। परंतु इनमें क्या वेदविरुद्ध असत्य हैं और क्या वेदानुकूल सत्य हैं, उसके निर्णय के लिए पहले वेद ही पढ़ने चाहिए। हमारे कुछ अन्य महाभारत और वाल्मीकि रामायण, मनुस्मृति आदि ऐतिहासिक और स्मृति ग्रन्थों में भी प्रक्षेप हुए हैं, जिन्हें विद्वानों के सहयोग से आर्य प्रकाशनों द्वारा शुद्ध करके छापा गया है, उनको ही पढ़ना चाहिए।॥ओ३म् तत्सत्॥

DharmaSpirituality+1
आचार्य विजय आर्यNov 4, 2025
179
वेदों का उत्पत्तिकाल और महत्त्व

वेदों का उत्पत्तिकाल और महत्त्व

१. परमात्मा द्वारा सृष्टि के आदि में वेदों की उत्पत्ति-प्रकाट्य-प्रादुर्भाववेदों के उत्पत्ति काल के विषय में पाश्चात्य विद्वानों के साथ भारतीय विद्वानों में भी परस्पर मतभेद है - कुछ लोग वेद को कुछ हजार वर्ष पूर्व और कुछ करोड़ों वर्ष पूर्व का मानते हैं। पाश्चात्य विद्वान् मैक्समूलर और मैकडॉनल के मत में वेदों का उत्पत्ति काल ईसा पूर्व १२०० वर्ष है। इन सभी मतों को असत्य सिद्ध करते हुए महाभारत में महर्षि वेदव्यास वेदों को सृष्टि के आदि में प्रकट हुआ मानते हैं -अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयंभुवा।आदौ वेदमयी दिव्या यतः सर्वाः प्रवृत्तयः ॥ - महाभारत, शांतिपर्व २३२ । २४(भाव: सृष्टि के आदि में स्वयम्भू परमात्मा से वेदरूपी दिव्य वाणी का प्रादुर्भाव हुआ, जो नित्य है और जिससे सारी प्रवृत्तियाँ चलीं।)(यहाँ कोई संदेह करें कि वेदों को अनादि और नित्य भी माना गया और इसकी उत्पत्ति भी बताई गई, तो इसका अर्थ यह है कि वेद परमात्मा के अनन्त ज्ञान में सदैव विद्यमान रहते हैं, उसी के कारण यह नित्य भी हैं; परन्तु सृष्टि को बनाने के साथ परमात्मा मनुष्य को अपने अनन्त ज्ञान से वेदज्ञान भी देता है, इसी को व्यवहारिक भाषा की दृष्टि से वेदों की उत्पत्ति कह दिया जाता है, परन्तु वास्तव में यह मनुष्य को वेदज्ञान देने की प्रक्रिया है।)स्वयं ऋग्वेद के अनुसार सर्गारम्भ में ऋषियों से ईश्वरप्रदत्त वेद का आविर्भाव हुआ -बृहस्पते प्रथमं वाचो अग्रं यत्प्रैरत नामधेयं दधानाः।यदेषां श्रेष्ठं यदरिप्रमासीत्प्रेणा तदेषां निहितं गुहाविः॥ - ऋग्वेद १०/७१/१(भावार्थ: सृष्टि हो चुकी, मनुष्यों की उत्पत्ति हो चुकी। परमात्मा ने सर्गारम्भ में श्रेष्ठ ऋषियों को वेदज्ञान दिया। यह वाणी का प्रथम प्रकाश था।)ऋतं च सत्यं चाभिद्धात्तपसोऽध्यजायत। - ऋग्वेद १० । १९० । १(परमात्मा ने अपने ज्ञानबल से ऋत और सत्य के नाम से मानव मात्र के लिए वेदविद्या रूपी सम्पूर्ण विधि-विधान का निर्माण किया।)सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् ।वेदशब्देभ्य एवाऽऽदौ पृथक्संस्थाश्च निर्ममे ॥ - मनुस्मृति १ । २१(परमात्मा ने सृष्टि के आरम्भ में वेद के शब्दों से ही पदार्थों के नाम, कर्म और विभागों की रचना की।)क्या परमात्मा के ज्ञान का सृष्टि के आरंभ में प्रकट होना आवश्यक है?(उत्तर: हाँ। सृष्टि निर्माण के साथ ही यदि ज्ञान न मिले, तो यह पक्षपातपूर्ण होता। मैक्समूलर तक ने इसे स्वीकारा है।)"If there is a God who has created heaven and earth it will be unjust on his part, if he deprives millions of his sons, born before Moses, of his divine knowledge..." - Max Müller२. वेद स्वतः प्रमाण, परम प्रमाण और ईश्वर-प्रदत्त (अपौरुषेय) हैंनिजशक्त्यभिव्यक्तेः स्वतः प्रामाण्यम्। - सांख्यदर्शन ५।५१(परमात्मा की शक्ति से प्रकट होने से वेद स्वतः प्रमाण हैं।)अर्थकामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते।धर्मजिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ॥ - मनुस्मृति - २/१३तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् ॥ - वैशेषिक दर्शन १।१।३शास्त्रयोनित्वात्।―(वेदान्तदर्शन १/१/३)न पौरुषेयत्वं तत्कर्तुः पुरुषस्याभावात्।।―(सांख्यदर्शन ५/४६)(वेद अपौरुषेय हैं क्योंकि उनका रचयिता कोई मनुष्य नहीं है।)३. वेदों की रचना बुद्धिपूर्वक हैबुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे। - वैशेषिक दर्शन ६।१।१(वेद की रचना तर्क और बुद्धि से सम्पन्न है।)४. सब वेद धर्म के मूल और ज्ञानमय हैंवेदोऽखिलो धर्ममूलम्। - (मनु २-६)सर्वज्ञानमयो हि सः। - (मनु० २.७)(वेद सर्वज्ञान का स्रोत हैं।)५. ब्राह्मणादि द्विजों का परम धर्म और तप - वेदाभ्यासयोऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्।स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः॥ - मनु० २।१६८या हि नः सततं बुद्धिर्वेदमन्त्रानुसारिणी।त्वत्कृते सा कृता वत्स वनवासानुसारिणी।हृदयेष्वेव तिष्ठन्ति वेदा ये नः परं धनम्।वत्स्यन्त्यपि गृहेष्वेव दाराश्चारित्ररक्षिताः॥―(वा० रा० अयो० ५४/२४,२५)(श्रीराम वन जा रहे थे, तब ब्राह्मणों ने कहा कि वेद हमारे हृदय में हैं और वे ही हमारा धन हैं।)६. वेदों की निंदा करने वाला नास्तिक हैनास्तिको वेदनिन्दकः - (मनु० २/११)(वेद को न मानने वाला ही सच्चा नास्तिक है।)७. चार ऋषियों के माध्यम से वेदों का प्रादुर्भावतेभ्यस्तप्तेभ्यस्त्रयो वेदा अजायन्त, अग्नेर्ऋग्वेदो, वायोर्यजुर्वेदः, सूर्यात्सामवेदः। - शतपथ ब्राह्मण ११/५/२/३एवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्।यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः ॥ - शतपथ ब्राह्मण १४/५अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम्।दुदोह यज्ञसिद्ध्यर्थमृग्यजुःसामलक्षणम्॥ - मनुस्मृति १ । २३(आदि सृष्टि में परमात्मा ने ऋषियों के माध्यम से चारों वेदों का प्रादुर्भाव किया।)प्रश्न - मुण्डक उपनिषद में ब्रह्मा के पुत्र अंगिरस का वर्णन है...(उत्तर: अंगिरा नाम के अनेक ऋषि हुए हैं, जैसे परशुराम नाम के। अतः अंगिरा भी अनेक हो सकते हैं।)[लेख रचना में विभिन्न पुस्तकों से सहायता ली गई है।]

DharmaSpirituality+1
आचार्य विजय आर्यNov 3, 2025
472
वेदों की संख्या और रचना किसने और कैसे की? (प्रमाण सहित)

वेदों की संख्या और रचना किसने और कैसे की? (प्रमाण सहित)

वेदों की संख्या1. क्या प्रारंभ में एक ही वेद था, जो बाद में चार भागों में महर्षि व्यास द्वारा विभाजित कर दिया गया?वास्तव में मानव सृष्टि के बाद प्रारंभ से ही चार वेद थे। परन्तु कुछ पुराण जैसे वायु, विष्णु, मत्स्य एवं अग्नि पुराण में ऐसा वर्णन है कि प्रारंभ में एक ही वेद था, द्वापर के अंत में कृष्णद्वैपायन व्यास ने उसे चार भागों में बाँट दिया।यह कहने मात्र का अंतर है, क्योंकि सृष्टि के आदि में दिया गया ईश्वरीय ज्ञान तो समग्र रूप से एक ही था, भले ही चार वेदों में हो, और उसी वेदज्ञान को अन्य ऋषियों की भांति द्वापर के अंत में कृष्णद्वैपायन व्यास ने समझाया हो।व्यास जी वेदों के रचयिता नहीं थे, क्योंकि वेद तो व्यास जी के पहले से थे। चारों वेदों के नाम से प्रारंभ से ही चार वेद हैं।स्वयं वेदों, वेदोत्तर वाङ्मय तथा अन्य आप्त वचनों से प्रमाणित है कि सृष्टि के आदि में ही एक साथ चारों वेदों का प्रादुर्भाव हुआ।वेदव्यास द्वारा वेद के चार विभाग किये जाने की कल्पना अयुक्त तथा सर्वथा असंगत है।व्यास के पूर्व तो उपनिषद् तथा ब्राह्मण ग्रन्थ अस्तित्व में आ चुके थे और उनमें चारों वेदों की शाखाओं का वर्णन है। स्पष्ट रूप से पहले चार वेद होने पर ही उनकी शाखाएं बनीं।यह हो सकता है कि वेदव्यास ने अपने समय में भिन्न-भिन्न बहुत-सी शाखाएँ बन जाने के कारण ब्राह्मण और श्रौतसूत्रादि का निश्चय कर दिया हो कि किस-किस शाखा का कौन-कौन-सा ब्राह्मण है। यह भी सम्भव है कि उन्होंने शाखाओं का प्रवचन वा उनकी व्यवस्था की हो।2. प्रारंभ से ही चारों वेदों के क्या प्रमाण हैं?समस्त आर्यधर्मग्रंथों जैसे ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद, महाभारत, मनुस्मृति, यहाँ तक कि वेद से भी चार वेदों के प्रमाण मिलते हैं।कुछ प्रमुख प्रमाण:ऋग्वेद ४/५८/३, यजुर्वेद १७/९१चत्वारि शृङ्गास्त्रयोऽस्य पादाः।निरुक्त १३/७: चत्वारि शृङ्गा वेदा वा एता उक्ताः।अथर्ववेद ४/३५/६यस्मिन् वेदा निहिता विश्वरूपाः।अथर्ववेद १९/९/१२ब्रह्म प्रजापतिर्धाता लोका वेदाः सप्तऋषयोऽग्नयः।ऋग्वेद १०/९०/९, यजुर्वेद ३१/७तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतः, ऋचः सामानि जज्ञिरे...मुण्डक उपनिषद १/१/५तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः।छांदोग्य उपनिषद ७/७/२विज्ञानेन वा ऋग्वेदं विजानाति यजुर्वेदं सामवेदम् अथर्वणं चतुर्थम्।गोपथ ब्राह्मण पूर्व १/१६, ५/१६अथर्ववेद को ब्रह्मवेद कहा गया है।महाभारत सभा पर्व ११/३२ऋग्वेदः सामवेदश्च यजुर्वेदश्च पाण्डव। अथर्ववेदश्च तथा सर्वशास्त्राणि चैव हि॥वाल्मीकि रामायण किष्किन्धा कांड, तृतीय सर्गनानृग्वेद-विनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः। नासामवेदविदुषः शक्यमेवं विभाषितुम्॥२८॥गोपथ ब्राह्मण पूर्वभाग ३/१ऋग्विदमेव होतारं वृणीष्व... अथर्वाङ्गिरोविदं ब्रह्माणम्।3. कुछ कहते हैं कि वेद तो तीन ही हैं। क्या अथर्ववेद बाद में जोड़ा गया है?यह कहना पूर्णतः गलत है। ऊपर दिए प्रमाणों में चारों वेद एक साथ वर्णित हैं।त्रयी विद्या का अर्थ केवल तीन वेदों का अस्तित्व नहीं है, बल्कि तीन प्रकार की विद्याओं (ज्ञान, कर्म, उपासना) की ओर संकेत करता है, जो चारों वेदों में विद्यमान है।महाभारत शान्ति पर्व २३५/१त्रयीविद्यामवेक्षेत वेदेषूक्तामथाङ्गतः...शतपथ ब्राह्मण ४/६/७/१त्रयी वै विद्या ऋचो यजूंषि सामानि।4. क्या यह ठीक है कि चारों वेदों की उत्पत्ति ब्रह्मा के चारों मुखों से हुई है?यह एक आलंकारिक कथन है। इसका तात्पर्य यह है कि वेदों की उत्पत्ति ईश्वर से हुई है, किसी अन्य देवता या व्यक्ति से नहीं।यजुर्वेद ३१/७तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतः ऋचः सामानि जज्ञिरे...अथर्ववेद १०/७/२०यस्मादृचो अपातक्षन् यजुर्यस्मादपाकषन्...शतपथ ब्राह्मण १४/५ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः इत्यादि॥मनुस्मृति १/२३अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्मा सनातनम्...क्या महाभारत को वेदव्यास ने लेखनीबद्ध किया?कुछ मतों के अनुसार महाभारत काल में वेदों का लिपिबद्ध रूप में संकलन हुआ। लेकिन ब्राह्मण ग्रंथ, उपनिषद, रामायण आदि ग्रंथ महाभारत से पूर्व के हैं और उनका अस्तित्व है, जिससे यह प्रमाणित होता है कि वेदों का भी लिपिबद्ध रूप पहले से संभव था।महर्षि दयानंद ने माना है कि इक्ष्वाकु वंश से लेखन की परंपरा प्रारंभ हुई।5. क्या वैदिक संस्कृत भाषा मानव सृष्टि के प्रारंभ से है?हाँ, वैदिक संस्कृत विश्व की सबसे प्राचीन भाषा है और आज की समस्त भाषाओं की जननी है। भाषाशास्त्र भी इस पर सहमत हैं।6. क्या वेदों को मनुष्य ने बनाया?नहीं। मनुष्य का ज्ञान सीमित, विरोधाभासयुक्त एवं परिस्थितियों पर आधारित होता है।वेद सार्वलौकिक ज्ञान हैं, जिनका स्रोत केवल परमेश्वर हो सकता है।7. क्या वेदज्ञान के अलावा मनुष्य ज्ञान का विकास नहीं कर सकता?विकास कर सकता है, निर्माण नहीं।ज्ञान दो प्रकार का होता है:नैमित्तिक - ईश्वरप्रदत्त (जैसे वेद)स्वाभाविक - मनुष्य का अनुभव आधारित (जैसे विज्ञान, कला)8. वेदों का आविर्भाव कितने वर्ष पहले हुआ?मानव सृष्टि के प्रारंभ में —१,९६,०८,५३,१२५ वर्ष पूर्व (वैदिक कालगणना के अनुसार)लगभग दो अरब वर्ष (वैज्ञानिक अनुमानों के अनुसार)9. फिर पाश्चात्य विद्वान वेदों का रचनाकाल दो-चार हजार वर्ष ईसा-पूर्व क्यों मानते हैं?इसके कई कारण हैं:वे वैदिक वाङ्मय से अपरिचित हैंवे बाइबिल की सीमित समयरेखा (8,000 वर्ष) के कारण वेदों को प्राचीन नहीं मानतेपश्चिमी लेखकों का दृष्टिकोण पक्षपाती हैजबकि वेदों में इतिहास नहीं, ज्ञान है। उनका काल अत्यंत प्राचीन है और किसी मानव द्वारा रचित नहीं है।

DharmaSpirituality+1
आचार्य विजय आर्यNov 2, 2025
485
महान भारतीय गणितज्ञ और खगोलशास्त्री -Brahmagupta की जीवनी

महान भारतीय गणितज्ञ और खगोलशास्त्री -Brahmagupta की जीवनी

भारत ने दुनिया को कई महान वैज्ञानिक, गणितज्ञ और खगोलशास्त्री दिए हैं। इन्हीं में से एक थे ब्रह्मगुप्त – एक ऐसा नाम जिसने शून्य को एक संख्‍या की तरह परिभाषित किया और गणित को एक नई दिशा दी। आज अगर दुनिया में कैलकुलेटर, कंप्यूटर या साइंस का इतना विकास हुआ है, तो उसके पीछे कहीं न कहीं ब्रह्मगुप्त की सोच और काम भी शामिल है।इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि ब्रह्मगुप्त कौन थे, उनका बचपन कैसा था, उन्होंने गणित और खगोल विज्ञान के क्षेत्र में क्या योगदान दिए, और क्यों आज भी उन्हें भारत और दुनिया के महानतम गणितज्ञ और खगोलशास्त्रियों में गिना जाता है।बचपन और शुरुआती जिंदगीब्रह्मगुप्त का जन्म 598 ईस्वी में राजस्थान के भीनमाल (पुराना नाम: भिल्लमाल) नाम की जगह पर हुआ था। उनके पिता का नाम जैशिष्ठ था, जो खुद भी खगोलशास्त्र के जानकार थे। और ब्रह्मगुप्त को भी खगोलशास्त्र और गणित की आरंभिक शिक्षा अपने पिता से मिली थी।भीनमाल उस समय विद्या और ज्ञान का बड़ा केंद्र था। ब्रह्मगुप्त ने वहीं पढ़ाई की और धीरे-धीरे इतने ज्ञानी बन गए कि 30 साल की उम्र में उज्जैन की वेधशाला (observatory) के प्रमुख बन गए। उस समय उज्जैन खगोलशास्त्र की दुनिया का केंद्र था।ब्रह्मगुप्त की प्रमुख किताबेंब्रह्मगुप्त ने कई किताबें लिखीं, जिनमें से दो सबसे ज्यादा मशहूर हैं:ब्राह्मस्फुटसिद्धात (628 ईस्वी)यह उनकी सबसे मशहूर और असरदार किताब है। इसमें उन्होंने शून्य और ऋणात्मक संख्याओं (negative numbers) का इस्तेमाल बताया। साथ ही खगोल और गणित से जुड़ी कई बातें लिखीं।खण्डखाद्य (665 ईस्वी)यह किताब ज्यादातर ग्रहों की गणना और पंचांग बनाने से जुड़ी है। इसमें बताया गया कि ग्रहों की स्थिति कैसे निकाली जाती है, ग्रहण कब और कैसे होगा आदि।गणित में ब्रह्मगुप्त के प्रमुख कार्य1. शून्य का विस्तार और नियमब्रह्मगुप्त पहले व्यक्ति थे जिन्होंने शून्य को एक स्वतंत्र संख्या की तरह माना और उसके साथ किए जा सकने वाले गणितीय कार्यों के नियम तय किए। ब्राह्मस्फुटसिद्धांत में उन्होंने लिखा:"जब किसी धन (positive) संख्या से उसी के बराबर की धन संख्या घटाई जाती है, तो परिणाम शून्य होता है।"गुणा, भाग, जोड़, घटाव के नियम:जोड़: a + 0 = a → उदाहरण: 5 + 0 = 5घटाव: a - 0 = a → उदाहरण: 5 - 0 = 5गुणा: a × 0 = 0 → उदाहरण: 5 × 0 = 0भाग: 0 ÷ a = 0 (a ≠ 0) → उदाहरण: 0 ÷ 5 = 0a ÷ 0 = ? → ब्रह्मगुप्त ने माना कि यह “अनिर्धारित” है (आज भी undefined मानी जाती है)ब्रह्मगुप्त ने division by zero को '0/0 = 0' जैसा माना, लेकिन बाद में यह सिद्ध किया गया कि 0 से भाग असंभव है। फिर भी, उस दौर के हिसाब से ये बड़ी सोच थी।2. ऋणात्मक संख्याओं के नियमब्रह्मगुप्त से पहले ऋणात्मक संख्याओं का कोई निश्चित प्रयोग नहीं था। उन्होंने सबसे पहले इसे स्वीकार किया और इनके साथ कैलकुलेशन के नियम तय किए।उदाहरण:ऋण × ऋण = धन → नुकसान × नुकसान = फायदा → (-3) × (-2) = +6ऋण × धन = ऋण → नुकसान × फायदा = नुकसान → (-3) × 2 = -6धन – ऋण = धन + धन → फायदा – नुकसान = ज्यादा फायदा → 5 - (-3) = 8ऋण – धन = और ज्यादा ऋण → नुकसान – फायदा = ज्यादा घाटा → -5 - 3 = -83. बीजगणित में योगदान (Algebra)ब्रह्मगुप्त ने पहली बार quadratic equations (x² + bx = c) को हल करने का systematic तरीका बताया।उनके द्वारा हल किया गया समीकरण:ax² + bx = cउन्होंने बताया कि इसे हल करने के लिए:x = [√(b² + 4ac) – b] / 2aआज इसे हम quadratic formula कहते हैं। उन्होंने इसे शब्दों और उदाहरणों के ज़रिए समझाया, क्योंकि उनके समय में प्रतीक (symbols) का उपयोग नहीं होता था।4. ब्रह्मगुप्त का प्रमेय (Theorem)यह प्रमेय ज्यामिति से जुड़ा हुआ है। उन्होंने बताया कि अगर कोई चतुर्भुज एक वृत्त के अंदर बना हो, और उसके विकर्ण एक-दूसरे को समकोण (90 डिग्री) पर काटते हों, तो उसमें एक खास तरह का संतुलन रहता है।इसके साथ ही उन्होंने एक और फॉर्मूला दिया जिसे ब्रह्मगुप्त सूत्र कहते हैं — इससे चतुर्भुज का क्षेत्रफल निकाला जा सकता है:क्षेत्रफल = √{(s-a)(s-b)(s-c)(s-d)}जहाँ a, b, c, d चतुर्भुज की भुजाएं हैं, औरs = (a + b + c + d)/25. प्रगति श्रृंखला (Progressions)ब्रह्मगुप्त ने अंक श्रंखला (series) की गणना करना सिखाया, जैसे:Arithmetic Progression (AP)Geometric Progression (GP)उदाहरण:AP = a, a+d, a+2d, ..., a+(n–1)dउसका योग = (n/2)[2a + (n–1)d]आज जो हम कक्षा 10-12 में पढ़ते हैं, वो उन्होंने 7वीं सदी में ही दे दिया था।खगोलशास्त्र में ब्रह्मगुप्त का योगदानग्रहों की गति और स्थिति की गणनाउन्होंने बताया कि कैसे ग्रह सूर्य के चारों ओर चलते हैं और उनकी स्थिति किसी भी दिन कैसे निकाली जा सकती है।उनकी गणना पद्धति इतनी सटीक थी कि उसका उपयोग सैकड़ों वर्षों तक पंचांग बनाने में किया गया।सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण की भविष्यवाणीउन्होंने वैज्ञानिक ढंग से समझाया कि ग्रहण खगोलीय घटना है, न कि कोई राक्षस निगलता है।पृथ्वी की गोलाई और गुरुत्वाकर्षण का विचारब्रह्मगुप्त ने माना कि पृथ्वी गोल है और वस्तुएं उसकी ओर खींची जाती हैं — यह सोच न्यूटन से 1000 साल पहले आई।दैनिक समय और दिन-रात की गणनाउन्होंने बताया कि नाड़ी, पल, मास, और वर्ष की सही गणना कैसे की जाए। सूर्योदय-सूर्यास्त निकालने की विधि भी बताई।त्रिकोणमिति का इस्तेमालउन्होंने साइन (ज्या), कोसाइन (कोज्या) और तालिकाएं दीं — जो modern trigonometry की नींव बनीं।धर्म और विज्ञान का संतुलनब्रह्मगुप्त धार्मिक थे, शिवभक्त थे, लेकिन उन्होंने विज्ञान को कभी रोका नहीं। उनकी कई धारणाएं आज भी वैज्ञानिक रूप से सही मानी जाती हैं।हालांकि उन्होंने यह नहीं माना कि पृथ्वी घूमती है, पर उनकी बाकी गणनाएं बहुत सटीक थीं।ब्रह्मगुप्त का असर दुनिया परअब्बासी खलीफा अल-मंसूर के आदेश पर उनकी किताबों का अरबी में अनुवाद हुआ, जिसे "Sindhind" कहा गया।उनके विचार इस्लामी दुनिया से यूरोप पहुंचे। आज जो Arabic numerals (0–9) हम कहते हैं, वो असल में Indian numerals हैं — और ब्रह्मगुप्त उनके प्रमुख जनक हैं।आखिरी समय और विरासतउनका निधन 668 ईस्वी के आसपास माना जाता है।उनका काम आने वाले सैकड़ों सालों तक भारत, अरब और यूरोप के वैज्ञानिकों के लिए आधार बना रहा।निष्कर्षब्रह्मगुप्त ने “शून्य” को संख्या बनाया, ऋणात्मक संख्याओं को समझाया, कठिन समीकरण हल किए और तारों-ग्रहों की स्थिति बताई।वो एक ऐसे वैज्ञानिक थे जिनकी सोच आज की तकनीक की नींव है।अगली बार जब आप 0 देखें, तो समझिए — उसके पीछे ब्रह्मगुप्त की सोच है।इतना समय देकर पढ़ने के लिए धन्यवाद।

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Shreyash Katiyar Nov 2, 2025
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